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फिजियोथेरेपी क्लीनिकों पर बायो-मेडिकल वेस्ट सर्टिफिकेट का बोझ क्यों?दो साल से भटक रहे संचालक,समाधान अब भी अधूरा

जबलपुर | स्वास्थ्य | प्रशासन

फिजियोथेरेपी क्लीनिकों पर बायो-मेडिकल वेस्ट सर्टिफिकेट का बोझ क्यों?दो साल से भटक रहे संचालक,समाधान अब भी अधूरा

जबलपुर में फिजियोथेरेपिस्टों ने उठाए सवाल,प्रदूषण बोर्ड के पत्र के बावजूद नहीं मिली राहत

जबलपुर।शहर के फिजियोथेरेपी क्लीनिक संचालक इन दिनों एक ऐसी प्रशासनिक प्रक्रिया से जूझ रहे हैं,जिसे लेकर वे लगातार सवाल उठा रहे हैं।जिन क्लीनिकों में न तो सर्जिकल प्रक्रिया होती है,न इंजेक्शन लगाए जाते हैं और न ही किसी प्रकार का जैविक चिकित्सा अपशिष्ट (बायो-मेडिकल वेस्ट) निकलता है,उनसे बायो-मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट प्रमाण-पत्र और एनओसी मांगी जा रही है।

भौतिक चिकित्सक कल्याण संघ का कहना है कि इस संबंध में वे जुलाई 2023 से शासन और संबंधित विभागों के समक्ष अपनी बात रख रहे हैं,लेकिन अब तक स्पष्ट निर्णय नहीं हो पाया है।परिणामस्वरूप सैकड़ों फिजियोथेरेपिस्ट अनावश्यक प्रशासनिक और आर्थिक दबाव का सामना कर रहे हैं।

क्या है पूरा मामला?

फिजियोथेरेपी क्लीनिकों के संचालकों का आरोप है कि उनसे बायो-मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट के नाम पर प्रमाण-पत्र लेने और शुल्क जमा करने की अपेक्षा की जा रही है।जबकि इन केंद्रों में सामान्यतःकेवल फिजिकल एक्सरसाइज,मैनुअल थेरेपी, इलेक्ट्रोथेरेपी और अन्य गैर-आक्रामक उपचार पद्धतियों का उपयोग होता है।

संघ का तर्क है कि जब क्लीनिकों से जैविक कचरा उत्पन्न ही नहीं होता,तब बायो-मेडिकल वेस्ट सर्टिफिकेट की अनिवार्यता का कोई औचित्य नहीं बनता।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने भी माना,नहीं बनता बायो-मेडिकल वेस्ट

मामले में महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने स्वयं अपने पत्राचार में स्वीकार किया है कि फिजियोथेरेपी केंद्रों में सामान्यतःबायो-मेडिकल वेस्ट उत्पन्न नहीं होता।

जानकारी के अनुसार,हेल्थ कमिश्नर के निर्देश पर बोर्ड ने 5 मई 2025 को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) को पत्र भेजकर इस विषय में मार्गदर्शन मांगा था।बोर्ड ने अपने पत्र में स्पष्ट उल्लेख किया कि फिजियोथेरेपी क्लीनिकों में जैविक चिकित्सा अपशिष्ट उत्पन्न होने की संभावना नगण्य है।

बाद में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से प्राप्त जवाब में भी फिजियोथेरेपी क्लीनिकों के लिए अलग से किसी प्रमाण-पत्र की अनिवार्यता का उल्लेख नहीं किया गया।

होम्योपैथी क्लीनिकों को मिली राहत,फिजियोथेरेपी अब भी इंतजार में

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल समान परिस्थितियों में अलग-अलग व्यवहार को लेकर उठ रहा है।

केंद्रीय बोर्ड से मार्गदर्शन मिलने के बाद राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने स्वास्थ्य विभाग को सुझाव दिया था कि होम्योपैथी क्लीनिकों को बायो-मेडिकल वेस्ट नियमों की बाध्यता से बाहर रखा जाए। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग ने नोटिस जारी कर होम्योपैथी क्लीनिकों के लिए एनओसी की आवश्यकता समाप्त कर दी।

हालांकि फिजियोथेरेपी क्लीनिकों को अब तक ऐसी कोई राहत नहीं मिली है,जबकि उनकी कार्यप्रणाली भी जैविक चिकित्सा अपशिष्ट उत्पन्न नहीं करती।

फिजियोथेरेपिस्टों ने उठाया दोहरे मापदंड का मुद्दा

भौतिक चिकित्सक कल्याण संघ का कहना है कि यदि होम्योपैथी क्लीनिकों को बायो-मेडिकल वेस्ट नियमों से छूट दी जा सकती है,तो फिजियोथेरेपी क्लीनिकों को इससे बाहर रखने का कोई तर्कसंगत आधार नहीं है।

संघ के पदाधिकारियों का कहना है कि अस्पतालों और सर्जिकल केंद्रों में खून,सुइयां,पट्टियां,कॉटन और अन्य संक्रमित सामग्री निकलती है,जिसके लिए विशेष वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम की आवश्यकता होती है।लेकिन फिजियोथेरेपी क्लीनिकों में ऐसी कोई गतिविधि नहीं होती।

विशेषज्ञों की राय:नियमों की भावना के विपरीत है अनिवार्यता

स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि बायो-मेडिकल वेस्ट वही माना जाता है जो रक्त,शरीर के तरल पदार्थों या अन्य संक्रामक सामग्री से दूषित हो।

चूंकि फिजियोथेरेपी उपचार मुख्य रूप से नॉन-इनवेसिव (Non-Invasive)होते हैं और इनमें संक्रमित अपशिष्ट उत्पन्न नहीं होता,इसलिए इन केंद्रों पर बायो-मेडिकल वेस्ट प्रमाण-पत्र की अनिवार्यता लागू करना नियमों की मूल भावना से मेल नहीं खाता।

दो साल बाद भी नहीं निकला समाधान

जुलाई 2023 से शुरू हुआ यह मामला अब दो वर्ष से अधिक समय पार कर चुका है,लेकिन फिजियोथेरेपी क्लीनिक संचालकों को अभी तक स्पष्ट राहत नहीं मिल पाई है।

संघ ने शासन से मांग की है कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और केंद्रीय एजेंसियों की टिप्पणियों को आधार बनाकर फिजियोथेरेपी क्लीनिकों को अनावश्यक प्रमाण-पत्र और शुल्क संबंधी प्रक्रियाओं से मुक्त किया जाए,ताकि चिकित्सक मरीजों की सेवा पर ध्यान केंद्रित कर सकें।

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