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रेत का टेंडर अटका,अवैध कारोबार चमका!25-26 हजार में बिक रहा डंपर,नदी घाटों पर कौन रख रहा नजर?
विकास की कलम विशेष|वैध खनन पर अक्टूबर तक रोक,रेत की बढ़ती कीमतों के बीच अवैध उत्खनन की शिकायतों ने बढ़ाई चिंता
खास रिपोर्ट अमित तिवारी
जबलपुर।शहर और आसपास के इलाकों में निर्माण कार्यों के लिए रेत की मांग लगातार बनी हुई है,लेकिन वैध रेत खनन की प्रक्रिया लंबे समय से उलझी हुई है।इसका असर अब रेत के बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है।बताया जा रहा है कि एक डंपर रेत की कीमत 25 से 26 हजार रुपये तक पहुंच गई है।
एक तरफ वैध खदानों की निविदा प्रक्रिया बार-बार निरस्त हो रही है,दूसरी तरफ नदी घाटों से अवैध तरीके से रेत निकालकर बाजार तक पहुंचाए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं।ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है—जब वैध खनन व्यवस्था पूरी तरह सक्रिय नहीं है,तो बाजार में इतनी रेत आ कहां से रही है?
चार बार निरस्त हुआ टेंडर,अब अक्टूबर तक इंतजार
जिले में रेत खदानों की निविदा प्रक्रिया पिछले एक साल में करीब चार बार निरस्त होने की बात सामने आई है।बारिश के मौसम को देखते हुए अब अक्टूबर तक नई नीलामी प्रक्रिया पर रोक है।
इसका मतलब यह हुआ कि फिलहाल वैध रेत खनन व्यवस्था सामान्य रूप से शुरू होने में अभी समय लग सकता है।वहीं दूसरी ओर निर्माण कार्यों की जरूरत और रेत की मांग बनी हुई है।
यही परिस्थितियां अवैध कारोबार के लिए मुफीद माहौल तैयार कर सकती हैं।
रात होते ही नदी घाटों पर बढ़ती हलचल?
स्थानीय स्तर पर लगातार ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं कि दिन की अपेक्षा रात के समय नदी घाटों पर रेत उत्खनन और परिवहन की गतिविधियां बढ़ जाती हैं।
ग्रामीणों के अनुसार कई इलाकों में देर रात तक ट्रैक्टर-ट्रॉली और डंपरों की आवाजाही दिखाई देती है।कुछ स्थानों पर मशीनों के जरिए रेत निकालने की शिकायतें भी सामने आई हैं।
हालांकि इन शिकायतों की आधिकारिक पुष्टि संबंधित विभाग की जांच के बाद ही हो सकेगी।
कार्रवाई के बाद फिर शुरू हो जाता है खेल?
अवैध रेत उत्खनन और परिवहन के खिलाफ प्रशासन द्वारा समय-समय पर कार्रवाई की जाती है।वाहन पकड़े जाते हैं, जुर्माना लगाया जाता है और मशीनों पर भी कार्रवाई की जाती है।
लेकिन सवाल यह है कि यदि कार्रवाई के बाद कुछ दिनों में फिर वही गतिविधियां शुरू हो जाती हैं,तो आखिर निगरानी व्यवस्था में कमी कहां रह जाती है?
क्या केवल वाहनों को पकड़ने से समस्या खत्म होगी या फिर अवैध खनन के पूरे नेटवर्क तक पहुंचना जरूरी है?
महंगी रेत की मार सीधे निर्माण पर
रेत की कीमत बढ़ने का असर आम लोगों से लेकर निर्माण कारोबार तक पड़ता है।मकान बनाने वाले लोगों का बजट प्रभावित होता है और निर्माण लागत बढ़ती है।
जब एक डंपर रेत की कीमत 25-26 हजार रुपये तक बताई जा रही है,तब इसकी वास्तविक कीमत और रेत के स्रोत को लेकर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
प्रशासन यदि बाजार में बिक रही रेत के स्रोतों की जांच करे तो यह पता लगाया जा सकता है कि कितनी रेत वैध स्रोतों से आ रही है और कितनी की आपूर्ति अवैध तरीके से हो रही है।
रेत के साथ नदी का भी भविष्य दांव पर
रेत का अवैध उत्खनन केवल सरकारी राजस्व का मामला नहीं है।इसका सीधा असर नदी के प्राकृतिक स्वरूप पर भी पड़ सकता है।
बेतरतीब और अत्यधिक उत्खनन से नदी के किनारों का कटाव, जल प्रवाह में बदलाव और जलीय पर्यावरण पर असर जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
बारिश के मौसम में नदी घाट पहले से ही संवेदनशील रहते हैं। ऐसे समय में अवैध गतिविधियों पर निगरानी और भी जरूरी हो जाती है।
अक्टूबर तक प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती
नई वैध खनन प्रक्रिया अक्टूबर के बाद शुरू होने की संभावना के बीच अब प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि तब तक नदी घाटों से अवैध उत्खनन को कैसे रोका जाए।
इसके लिए सिर्फ मुख्य मार्गों पर वाहनों की जांच पर्याप्त नहीं होगी।घाट,स्टॉक पॉइंट,परिवहन मार्ग और रेत के संभावित अवैध भंडारण स्थलों पर भी निगरानी जरूरी है।
विकास की कलम विशेष:सवाल सिर्फ रेत का नहीं,सिस्टम का है
रेत की बढ़ती कीमत,वैध टेंडर प्रक्रिया में देरी और अवैध उत्खनन की शिकायतें—इन तीनों को अलग-अलग देखकर समस्या का समाधान नहीं निकलेगा।
प्रशासन को यह देखना होगा कि रेत की मांग पूरी करने के लिए वैध व्यवस्था कितनी जल्दी शुरू हो सकती है और तब तक अवैध खनन पर प्रभावी रोक कैसे लगाई जाए।
अब जवाब इन सवालों का चाहिए—
जब वैध खदानों का टेंडर अटका है,तो बाजार में रेत की आपूर्ति कहां से हो रही है?
रात के समय नदी घाटों पर होने वाली गतिविधियों की निगरानी कौन कर रहा है?
कार्रवाई के बावजूद अवैध कारोबार दोबारा सक्रिय क्यों हो जाता है?
और सबसे अहम—अक्टूबर तक नदी घाटों और सरकारी राजस्व की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है?
विकास की कलम विशेष की नजर अब इस बात पर रहेगी कि प्रशासन इन सवालों का जवाब कार्रवाई के जरिए देता है या सिर्फ कागजों में निगरानी तक मामला सीमित रहता है।
