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कलेक्ट्रेट में कमरों का संकट:बंद तालों के बीच घुट रहा प्रशासनिक सिस्टम,अधिकारियों को करना पड़ रहा कमरा शेयर

जबलपुर कलेक्ट्रेट में 109 कमरों के बावजूद जगह की कमी,4 अपर कलेक्टरों की तैनाती के बाद बढ़ी परेशानी

जबलपुर।जिला प्रशासन के मुख्यालय कलेक्ट्रेट में इन दिनों कमरों के आवंटन और उपलब्धता को लेकर स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है।कलेक्ट्रेट परिसर में कुल 109 कमरे होने के बावजूद कई कक्ष लंबे समय से अनुपयोगी पड़े हैं,जबकि दूसरी ओर अधिकारियों को बैठने के लिए पर्याप्त स्थान नहीं मिल पा रहा है।हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि कुछ अधिकारियों को एक ही कमरे में बैठकर काम करना पड़ रहा है।

लंबे समय तक अपर कलेक्टर के पद खाली रहने के बाद अब चार नए अपर कलेक्टरों की तैनाती से प्रशासनिक भवन में उपलब्ध स्थान को लेकर दबाव बढ़ गया है।डिप्टी कलेक्टरों और विभिन्न विभागों के अधिकारियों की मौजूदगी ने इस समस्या को और स्पष्ट कर दिया है।

109 कमरों का कलेक्ट्रेट,फिर भी अधिकारियों के लिए जगह का संकट

कलेक्ट्रेट परिसर में कमरों की संख्या पर्याप्त होने के बावजूद सभी कमरों का प्रभावी उपयोग नहीं हो पा रहा है।उपलब्ध जानकारी के अनुसार कुछ कमरे रिकॉर्ड रूम के पास हैं, जबकि तीन कमरे करीब एक वर्ष से संभागीय आयुक्त कार्यालय के नाम पर आरक्षित बताए जा रहे हैं।

इसके अलावा बरगी क्रूज हादसे से संबंधित जांच के बाद सेवानिवृत्त न्यायाधीश के लिए भी एक अलग कक्ष निर्धारित किया गया है।ऐसे में पहले से मौजूद सीमित उपयोगी स्थान पर प्रशासनिक दबाव बढ़ गया है।

एक कमरे में दो अधिकारी,कर्मचारियों की बढ़ी परेशानी

कमरों की कमी का असर सीधे तौर पर प्रशासनिक कामकाज पर दिखाई दे रहा है।बताया जा रहा है कि कुछ कमरों में दो अधिकारियों को बैठना पड़ रहा है।

कमरा नंबर 21 में एक ही कक्ष को दो अधिकारियों द्वारा साझा किए जाने की स्थिति सामने आने की बात कही जा रही है।वहीं कमरा नंबर 49 में अपर कलेक्टर स्तर के अधिकारी को डिप्टी कलेक्टर के साथ बैठना पड़ रहा है।

ऐसी व्यवस्था में अधिकारियों के साथ काम करने वाले कर्मचारियों को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। विशेष रूप से न्यायालयीन मामलों से जुड़े स्टाफ और संबंधित पीठासीन अधिकारियों के अलग-अलग स्थानों पर बैठने से फाइलों और कार्यों के समन्वय को लेकर दिक्कतें पैदा हो सकती हैं।

बंद कमरों के बीच बढ़ी जगह की समस्या

कलेक्ट्रेट में एक तरफ अधिकारी जगह के संकट से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कई कमरे लंबे समय से बंद बताए जा रहे हैं। कुछ कक्षों में पुरानी सामग्री,रद्दी और अन्य सामान रखे होने की बात सामने आई है।

मरम्मत और सफाई का काम चलने के कारण फिलहाल उपलब्ध स्थान और भी सीमित हो गया है।इससे अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए अस्थायी व्यवस्थाओं का सहारा लेना पड़ रहा है।

संभागीय आयुक्त कार्यालय के लिए आरक्षित कमरों पर भी सवाल

कलेक्ट्रेट परिसर में तीन कमरों को संभागीय आयुक्त कार्यालय के लिए आरक्षित किए जाने की चर्चा है।यदि इन कमरों का लंबे समय से उपयोग नहीं हो रहा है तो प्रशासन के सामने यह सवाल खड़ा होता है कि मौजूदा जरूरत को देखते हुए इनका वैकल्पिक उपयोग क्यों नहीं किया जा रहा।

हालांकि कमरों के आरक्षण और उपयोग को लेकर प्रशासनिक स्तर पर वास्तविक स्थिति क्या है,यह संबंधित रिकॉर्ड और आदेशों से ही स्पष्ट हो सकेगा।

बजट की कमी से अटकी नई व्यवस्था?

सूत्रों के अनुसार कलेक्ट्रेट भवन में नए कमरों के निर्माण और मौजूदा कमरों के नवीनीकरण के लिए पर्याप्त बजट उपलब्ध नहीं होने की समस्या बताई जा रही है।यही वजह है कि अधिकारियों की बढ़ती संख्या के अनुरूप स्थान उपलब्ध कराने की चुनौती बनी हुई है।

यदि प्रशासनिक भवन में नए अधिकारियों की तैनाती लगातार बढ़ती है तो भविष्य में यह समस्या और गंभीर हो सकती है।

सवालों के घेरे में कमरों का प्रबंधन

कलेक्ट्रेट में कमरों की कमी का मुद्दा केवल भवन विस्तार से जुड़ा नहीं है,बल्कि उपलब्ध संसाधनों के प्रबंधन का सवाल भी खड़ा करता है। यदि कुछ कमरे लंबे समय से बंद हैं और दूसरी ओर अधिकारी साझा कक्षों में काम करने को मजबूर हैं, तो प्रशासन को कमरों के मौजूदा आवंटन और उपयोग की समीक्षा करनी होगी।

अब उठ रहे ये सवाल

•109 कमरों वाले कलेक्ट्रेट में अधिकारियों के लिए पर्याप्त जगह क्यों नहीं?

•लंबे समय से बंद कमरों का उपयोग क्यों नहीं किया जा रहा?

•संभागीय आयुक्त कार्यालय के लिए आरक्षित कमरों की वर्तमान स्थिति क्या है?

•क्या सभी कमरों का वास्तविक उपयोग और आवंटन रिकॉर्ड उपलब्ध है?

•अधिकारियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए नई व्यवस्था कब तक तैयार होगी?

•क्या बजट की कमी के कारण नवीनीकरण और विस्तार रुका हुआ है?

प्रशासनिक कामकाज पर असर कितना?

कलेक्ट्रेट जिला प्रशासन का प्रमुख केंद्र है,जहां रोजाना बड़ी संख्या में अधिकारी,कर्मचारी और आम नागरिक अपने काम के लिए पहुंचते हैं।ऐसे में यदि अधिकारियों के बैठने की व्यवस्था ही अस्थायी या साझा कक्षों पर निर्भर हो जाए तो इसका असर कामकाज की गति और आम लोगों की पहुंच पर पड़ना स्वाभाविक है।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कलेक्ट्रेट प्रशासन उपलब्ध 109 कमरों का बेहतर प्रबंधन कर इस संकट का समाधान करेगा या फिर नए कमरों के निर्माण तक अधिकारियों को इसी अस्थायी व्यवस्था में काम करना पड़ेगा?

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