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Exclusive|पुराने वादों पर उठे सवाल,नए टेंडर में फिर शपथ पत्र!अल्ट्रा क्लीन कंपनी को लेकर नगर निगम की आउटसोर्स व्यवस्था पर घमासान

जबलपुर | नगर निगम | स्थानीय समाचार

पुराने वादों पर उठे सवाल,नए टेंडर में फिर शपथ पत्र!अल्ट्रा क्लीन कंपनी को लेकर नगर निगम की आउटसोर्स व्यवस्था पर घमासान

कर्मचारियों का आरोप—कागजों में नियमों का पालन, भुगतान में कथित कटौती;पुराने और नए शपथ पत्र की जांच की मांग

खास रिपोर्ट अमित तिवारी 

जबलपुर।नगर निगम जबलपुर की आउटसोर्स कर्मचारी व्यवस्था में अल्ट्रा क्लीन कंपनी को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है।कर्मचारियों की ओर से वेतन भुगतान और कथित कटौती को लेकर लगाए जा रहे आरोपों के बीच अब कंपनी द्वारा टेंडर प्रक्रिया में प्रस्तुत किए गए पुराने और नए शपथ पत्रों की निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है।

कर्मचारियों का आरोप है कि कंपनी ने टेंडर प्रक्रिया के दौरान नियमों और निर्धारित शर्तों के पालन का दावा किया,लेकिन जमीनी स्तर पर उन्हें उनकी मेहनत के अनुरूप पूरा भुगतान नहीं मिलने की शिकायतें सामने आती रही हैं।हालांकि,इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जांच और संबंधित दस्तावेजों के परीक्षण के बाद ही हो सकेगी।

पुराने और नए शपथ पत्र आमने-सामने रखने की मांग

मामले से जुड़े कर्मचारियों का कहना है कि नए टेंडर में कंपनी द्वारा प्रस्तुत शपथ पत्र को पुराने दस्तावेजों के साथ रखकर देखा जाना चाहिए।दोनों शपथ पत्रों में किए गए दावों,स्वीकार की गई शर्तों और वास्तविक कार्यप्रणाली का मिलान कराया जाए तो स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो सकती है।

कर्मचारियों का कहना है कि केवल निविदा दस्तावेजों में नियमों को स्वीकार करना पर्याप्त नहीं है।यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि अनुबंध अवधि के दौरान निर्धारित वेतन,पीएफ, ईएसआई,उपस्थिति और अन्य वैधानिक दायित्वों का वास्तव में कितना पालन हुआ।

कर्मचारियों का सवाल—मेहनत का पूरा पैसा कहां गया?

आउटसोर्स कर्मचारियों में वेतन को लेकर नाराजगी की बात सामने आ रही है।कर्मचारियों का दावा है कि उनसे निर्धारित कार्य कराया जाता है,लेकिन भुगतान को लेकर कथित कटौती की शिकायतें बनी हुई हैं।

उनका सवाल है कि यदि नगर निगम की ओर से निर्धारित दरों के आधार पर कंपनी को भुगतान किया गया है,तो नगर निगम के भुगतान रिकॉर्ड और कर्मचारियों के बैंक खातों में पहुंचे वास्तविक वेतन का मिलान क्यों नहीं कराया जाता?

कर्मचारियों का कहना है कि इस तरह का रिकॉर्ड सामने आने पर यह स्पष्ट हो सकता है कि निगम से जारी राशि और कर्मचारियों को मिले भुगतान में कोई अंतर है या नहीं।

नए टेंडर में फिर नियमों के पालन का दावा

मामले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पुराने अनुबंध को लेकर कर्मचारियों की शिकायतों के बीच कंपनी नए टेंडर में भी भाग ले रही है।बताया जा रहा है कि कंपनी ने निविदा प्रक्रिया के तहत नियमों और शर्तों के पालन से संबंधित नया शपथ पत्र प्रस्तुत किया है।

यहीं से सवाल उठ रहा है कि क्या नए टेंडर पर निर्णय लेने से पहले पुराने अनुबंध का स्वतंत्र ऑडिट कराया गया है?

जांच के दायरे में यह बिंदु शामिल किए जा सकते हैं—

•पुराने अनुबंध के दौरान कर्मचारियों को कितना भुगतान हुआ?

•नगर निगम ने कंपनी को कितनी राशि जारी की?

•कर्मचारियों के बैंक खातों में वास्तविक रूप से कितनी राशि पहुंची?

•पीएफ और ईएसआई का रिकॉर्ड क्या कहता है?

•उपस्थिति रजिस्टर और वास्तविक कर्मचारियों की संख्या में कोई अंतर है या नहीं?

•पुराने शपथ पत्र में किए गए दावों का पालन हुआ या नहीं?

•एक ही कंपनी को लाभ पहुंचाने के आरोप,निष्पक्ष जांच की मांग

टेंडर प्रक्रिया को लेकर कुछ प्रतिस्पर्धी पक्षों की ओर से भी पारदर्शिता की मांग किए जाने की बात सामने आई है।आरोप लगाया जा रहा है कि सभी कंपनियों की पात्रता, दस्तावेज और निविदा शर्तों की जांच एक समान मानदंड से होनी चाहिए।

हालांकि,किसी कंपनी या अधिकारी को बिना जांच दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। यदि प्रक्रिया नियमों के अनुसार हुई है तो संबंधित रिकॉर्ड से स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

नगर निगम के अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में

मामले में नगर निगम के अतिरिक्त स्वास्थ्य अधिकारी देवेंद्र सिंह चौहान और कार्यालय अधीक्षक अमित कुमार दुबे की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।कर्मचारियों की ओर से मांग की जा रही है कि निविदा से जुड़े दस्तावेजों के परीक्षण के साथ पुराने अनुबंध के भुगतान और उपस्थिति रिकॉर्ड की भी जांच की जाए।

यदि अधिकारियों ने दस्तावेजों का सत्यापन नियमों के मुताबिक किया है तो रिकॉर्ड से इसकी पुष्टि हो सकती है।वहीं किसी स्तर पर अनियमितता सामने आती है तो नियमानुसार जिम्मेदारी तय किए जाने की मांग की जा रही है।

कंपनी प्रबंधन पर कर्मचारियों ने लगाए गंभीर आरोप

कर्मचारियों ने कंपनी के डायरेक्टर मुकेश कालवे और जनरल मैनेजर विकास रजक की कार्यप्रणाली को लेकर भी आरोप लगाए हैं। कुछ कर्मचारियों का दावा है कि वेतन और अपने अधिकारों को लेकर आवाज उठाने पर नौकरी से हटाने का दबाव बनाया जाता है।

इन आरोपों की भी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।कंपनी प्रबंधन का पक्ष सामने आने के बाद ही आरोपों की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।

भुगतान और उपस्थिति रिकॉर्ड से सामने आ सकता है सच

पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजी जांच नगर निगम के भुगतान रिकॉर्ड,कंपनी के वेतन रजिस्टर और कर्मचारियों के बैंक खातों की हो सकती है।

इसके साथ पीएफ,ईएसआई,बायोमेट्रिक/एईबीएएस उपस्थिति और टेंडर में दर्शाए गए कर्मचारियों की संख्या का मिलान किया जाए तो यह पता चल सकता है कि कागजों में किए गए दावों और वास्तविक व्यवस्था में कोई अंतर है या नहीं।

अब नगर निगम के फैसले पर नजर

अल्ट्रा क्लीन कंपनी से जुड़े विवाद ने अब केवल कर्मचारियों के वेतन का मुद्दा नहीं,बल्कि नगर निगम की पूरी आउटसोर्स टेंडर व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही का सवाल खड़ा कर दिया है।

कर्मचारियों की मांग है कि पुराने और नए शपथ पत्रों की जांच की जाए,पुराने अनुबंध का भुगतान ऑडिट कराया जाए और कंपनी को नगर निगम से किए गए भुगतान का कर्मचारियों को हुए वास्तविक भुगतान से मिलान किया जाए।

अब देखने वाली बात यह होगी कि नगर निगम नए टेंडर पर आगे बढ़ने से पहले पुराने अनुबंध और कर्मचारियों की शिकायतों की विस्तृत जांच कराता है या नहीं।यदि रिकॉर्ड में सब कुछ नियमों के मुताबिक पाया जाता है तो कंपनी का पक्ष स्पष्ट होगा,लेकिन यदि दस्तावेजों में विरोधाभास सामने आते हैं तो संबंधित जिम्मेदारी भी तय करनी होगी।

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