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Exclusive:शपथ पत्र में‘सब सही’ का दावा,कर्मचारियों की शिकायतों ने उठाए सवाल;अल्ट्रा क्लीन के टेंडर पर जांच की मांग

जबलपुर न्यूज़ / नगर निगम / स्थानीय प्रशासन

शपथ पत्र में‘सब सही’ का दावा,कर्मचारियों की शिकायतों ने उठाए सवाल;अल्ट्रा क्लीन के टेंडर पर जांच की मांग

वेतन भुगतान से लेकर पुराने शपथ पत्र तक उठे सवाल, कर्मचारियों ने कहा—रिकॉर्ड की जांच हो तो सामने आएगी पूरी तस्वीर

खास रिपोर्ट अमित तिवारी 

जबलपुर।नगर निगम जबलपुर की आउटसोर्स कर्मचारी व्यवस्था को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है।अल्ट्रा क्लीन एंड केयर सर्विसेज को लेकर कर्मचारियों की ओर से कथित कम वेतन और भुगतान संबंधी शिकायतें सामने आने के बाद अब कंपनी द्वारा निविदा प्रक्रिया में प्रस्तुत किए गए शपथ पत्र की घोषणाओं को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि एक ओर कंपनी ने शपथ पत्र में नियमों के पालन और न्यूनतम मजदूरी से संबंधित मामलों में दोषी नहीं होने की घोषणा की है,जबकि दूसरी ओर कुछ कर्मचारी निर्धारित पारिश्रमिक से कम भुगतान किए जाने का आरोप लगा रहे हैं।हालांकि,इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है।ऐसे में शिकायतकर्ताओं ने पुराने और वर्तमान दस्तावेजों के साथ भुगतान रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।

शपथ पत्र में नियमों के पालन का दावा

शिकायतकर्ताओं के अनुसार,27 जुलाई 2026 को नोटरी के समक्ष प्रस्तुत शपथ पत्र के एक बिंदु में कंपनी की ओर से यह घोषणा की गई है कि संस्था को कर्मचारियों या श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी अथवा न्यूनतम पारिश्रमिक का भुगतान नहीं करने के मामले में किसी श्रम न्यायालय या सक्षम न्यायिक प्राधिकारी द्वारा दोषी नहीं ठहराया गया है।

शपथ पत्र में दी गई जानकारी को सत्य एवं सही बताते हुए किसी तथ्य को छिपाए नहीं जाने की घोषणा किए जाने की बात भी सामने आई है।

बताया गया है कि शपथ पत्र में यह शर्त भी शामिल है कि यदि दी गई जानकारी असत्य,भ्रामक या तथ्य छिपाकर दी गई पाई जाती है तो नगर निगम निविदा निरस्त करने,अनुबंध समाप्त करने और नियमानुसार कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होगा।

कर्मचारियों की शिकायतों से बढ़ा विवाद

दूसरी ओर,अतिक्रमण,स्वास्थ्य और उद्यान विभाग समेत विभिन्न स्थानों पर कार्यरत कुछ आउटसोर्स कर्मचारियों ने कंपनी पर उनकी मेहनत के अनुरूप भुगतान नहीं किए जाने के आरोप लगाए हैं।

कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने अपनी समस्याओं को लेकर संबंधित अधिकारियों से शिकायतें की हैं।अब शिकायतकर्ताओं का सवाल है कि यदि कंपनी द्वारा नियमों के पालन का दावा किया गया है,तो कर्मचारियों की शिकायतों की वास्तविक स्थिति क्या है और उनका निस्तारण किस आधार पर किया गया?

इसका जवाब दस्तावेजों और भुगतान रिकॉर्ड के स्वतंत्र मिलान से ही सामने आ सकता है।

पुराने शपथ पत्र की भी जांच की मांग

शिकायतकर्ताओं ने मांग की है कि केवल मौजूदा निविदा में प्रस्तुत शपथ पत्र की जांच न की जाए,बल्कि पिछली निविदा के दौरान कंपनी द्वारा प्रस्तुत किए गए दस्तावेज और शपथ पत्र भी सामने लाए जाएं।

उनका कहना है कि पुराने शपथ पत्र में किए गए दावों की तुलना वास्तविक भुगतान,कर्मचारियों की संख्या,उपस्थिति और अन्य सरकारी रिकॉर्ड से की जानी चाहिए। इससे यह स्पष्ट हो सकता है कि निविदा के समय किए गए दावों और जमीनी स्थिति में कोई अंतर था या नहीं।

‘नगर निगम ने कितना भुगतान किया,कर्मचारियों को कितना मिला?’

पूरे मामले में सबसे अहम कड़ी भुगतान रिकॉर्ड को माना जा रहा है।शिकायतकर्ताओं की मांग है कि जांच के दौरान नगर निगम से कंपनी को किए गए भुगतान और कर्मचारियों के बैंक खातों में पहुंचे वास्तविक वेतन का मिलान कराया जाए।

जांच में इन रिकॉर्ड को शामिल किए जाने की मांग की गई है—

•नगर निगम के भुगतान बिल

•कंपनी के वेतन रजिस्टर

•कर्मचारियों के बैंक खातों में भुगतान

•पीएफ और ईएसआईसी रिकॉर्ड

•बायोमेट्रिक/एईबीएएस उपस्थिति

•टेंडर में दर्शाई गई कर्मचारियों की संख्या

•संबंधित कार्यों में कर्मचारियों की वास्तविक तैनाती

यदि रिकॉर्ड में कोई अंतर मिलता है तो उसकी वजह और जिम्मेदारी निर्धारित करना भी जांच का अहम हिस्सा हो सकता है।

अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की मांग

शिकायतकर्ताओं ने नगर निगम के अतिरिक्त स्वास्थ्य अधिकारी देवेंद्र सिंह चौहान,अमित कुमार दुबे सहित संबंधित अधिकारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच की मांग की है।

हालांकि,किसी अधिकारी या कंपनी को जांच पूरी होने से पहले दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।जांच में यह देखा जाना चाहिए कि कर्मचारियों की शिकायतें कब प्राप्त हुईं,किस अधिकारी के समक्ष पहुंचीं,कंपनी के बिल किस आधार पर प्रमाणित किए गए और निविदा में प्रस्तुत दस्तावेजों का सत्यापन किस स्तर पर किया गया।

टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी सवाल

मामला अब केवल कर्मचारियों के वेतन तक सीमित नहीं रह गया है।यदि शिकायतों और दस्तावेजों में कोई विरोधाभास सामने आता है तो इसका असर निविदा प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी पड़ सकता है।

वहीं यदि जांच में कंपनी द्वारा प्रस्तुत घोषणाएं और सरकारी रिकॉर्ड सही पाए जाते हैं,तो कर्मचारियों की शिकायतों की वास्तविक स्थिति भी स्पष्ट हो सकेगी।

अब रिकॉर्ड की जांच से खुलेगा पूरा मामला

शिकायतकर्ताओं की मुख्य मांग है कि पुराने और वर्तमान शपथ पत्र,वेतन भुगतान,पीएफ-ईएसआईसी,उपस्थिति और नगर निगम से कंपनी को किए गए भुगतान का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए।

मामले की वास्तविक तस्वीर दस्तावेजी जांच के बाद ही सामने आएगी। फिलहाल एक तरफ शपथ पत्र में नियमों के पालन का दावा है, जबकि दूसरी तरफ कर्मचारियों की शिकायतें हैं।ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि दोनों दावों के बीच वास्तविक स्थिति क्या है?

यदि रिकॉर्ड में सब कुछ नियमानुसार पाया जाता है तो कंपनी की स्थिति स्पष्ट होगी। वहीं यदि दस्तावेजों और वास्तविक भुगतान में कोई गंभीर अंतर सामने आता है तो नियमानुसार जिम्मेदारी तय किए जाने की जरूरत होगी।

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