जबलपुर न्यूज़/नगर निगम
अल्ट्रा क्लीन कंपनी के खिलाफ कर्मचारियों ने फिर खोला मोर्चा,काम से दूरी का दावा;आउटसोर्स व्यवस्था पर उठे सवाल
मतदान सामग्री उतारने के दौरान निर्धारित संख्या में कर्मचारियों की मौजूदगी को लेकर विवाद,निजी श्रमिकों से काम कराने का दावा;वेतन भुगतान और कथित कटौती को लेकर कर्मचारियों में नाराजगी
जबलपुर।नगर निगम जबलपुर की आउटसोर्स कर्मचारी व्यवस्था को लेकर विवाद एक बार फिर सामने आया है। आउटसोर्स कर्मचारियों की आपूर्ति करने वाली अल्ट्रा क्लीन कंपनी को लेकर कर्मचारियों में नाराजगी और असंतोष की बात सामने आ रही है।कर्मचारियों का दावा है कि वेतन भुगतान, कथित कटौती और लंबे समय से चली आ रही समस्याओं के कारण कई कर्मचारी अब काम करने से पीछे हट रहे हैं।
ताजा मामला जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज (JEC) में मतदान सामग्री की पेटियां उतारने से जुड़ा बताया जा रहा है। कर्मचारियों के अनुसार,नगर निगम के विभिन्न विभागों से आउटसोर्स कर्मचारियों को मतदान सामग्री उतारने के लिए मौके पर भेजे जाने के निर्देश दिए गए थे।हालांकि,दावा है कि अपेक्षित संख्या में कर्मचारी वहां मौजूद नहीं हुए और बाद में निजी श्रमिकों की मदद से सामग्री उतरवाई गई।
इस घटनाक्रम ने नगर निगम की आउटसोर्स व्यवस्था में कर्मचारियों की वास्तविक उपलब्धता,उपस्थिति और ठेका एजेंसी की जवाबदेही को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
मतदान सामग्री उतारने के लिए कितने कर्मचारी पहुंचे?
कर्मचारियों की ओर से किए जा रहे दावे के मुताबिक,करीब 50 कर्मचारियों को मतदान सामग्री उतारने के कार्य के लिए भेजे जाने के निर्देश थे।लेकिन मौके पर अपेक्षित संख्या में कर्मचारी नहीं पहुंचने के कारण कथित तौर पर वैकल्पिक व्यवस्था करनी पड़ी।
यदि यह दावा सही है तो सवाल उठता है कि नगर निगम द्वारा आउटसोर्स एजेंसी के माध्यम से जिन कर्मचारियों की सेवाएं ली जा रही हैं,उनकी वास्तविक उपस्थिति और तैनाती की निगरानी किस स्तर पर की जा रही थी?
वेतन को लेकर नाराजगी,कर्मचारियों ने उठाए सवाल
कर्मचारियों का कहना है कि उनकी नाराजगी अचानक नहीं बढ़ी है।वेतन भुगतान में देरी और कथित कटौती को लेकर लंबे समय से असंतोष बना हुआ है।कर्मचारियों का कहना है कि जब उन्हें उनकी मेहनत का पूरा और समय पर भुगतान नहीं मिलता तो उनसे हर परिस्थिति में काम करने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है।
एक कर्मचारी ने नाम सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर कहा कि"जब हक का पैसा नहीं मिलेगा तो काम क्यों करें?"
हालांकि,कर्मचारियों द्वारा लगाए गए इन आरोपों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है।
क्या आउटसोर्स एजेंसी वास्तव में पूरी संख्या में कर्मचारी उपलब्ध करा रही है?
इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि नगर निगम और ठेका एजेंसी के बीच हुए अनुबंध में जितने कर्मचारियों की आवश्यकता निर्धारित की गई है,क्या उतनी संख्या में कर्मचारी वास्तव में कार्यस्थल पर उपलब्ध कराए जा रहे हैं?
यदि किसी महत्वपूर्ण सरकारी कार्य के दौरान निजी श्रमिकों की आवश्यकता पड़ी,तो यह भी जांच का विषय बन सकता है कि:
•कितने कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई गई थी?
•कितने कर्मचारी वास्तव में मौके पर पहुंचे?
•अनुपस्थित कर्मचारियों का रिकॉर्ड क्या है?
•निजी श्रमिकों को किसके निर्देश पर लगाया गया?
•निजी श्रमिकों के भुगतान की व्यवस्था किस मद से की गई?
•संबंधित एजेंसी से इस संबंध में जवाब मांगा गया या नहीं?
अल्ट्रा क्लीन कंपनी की भूमिका पर फिर सवाल
अल्ट्रा क्लीन कंपनी को लेकर पहले भी कर्मचारियों की ओर से वेतन और भुगतान संबंधी शिकायतें सामने आने की बात कही गई है।अब मतदान सामग्री उतारने के मामले ने विवाद को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।
कंपनी के डायरेक्टर मुकेश कालवे और जनरल मैनेजर विकास रजक की भूमिका को लेकर भी कर्मचारियों और शिकायतकर्ताओं की ओर से सवाल उठाए जा रहे हैं।वहीं नगर निगम के अधिकारियों देवेंद्र सिंह चौहान और अमित कुमार दुबे को लेकर भी चर्चाएं सामने आई हैं।
हालांकि, इन व्यक्तियों के खिलाफ लगाए जा रहे आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।संबंधित कंपनी प्रबंधन और अधिकारियों का पक्ष सामने आने के बाद ही मामले की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।
महापौर से कर्मचारियों की उम्मीद,हस्तक्षेप की मांग
कर्मचारियों ने नगर निगम के महापौर जगत बहादुर सिंह 'अन्नू' से भी मामले में हस्तक्षेप की मांग की है।कर्मचारियों का कहना है कि उनकी समस्याओं को केवल ठेका एजेंसी का आंतरिक मामला मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए,क्योंकि आउटसोर्स कर्मचारी नगर निगम की विभिन्न व्यवस्थाओं में प्रत्यक्ष रूप से काम कर रहे हैं।
कर्मचारियों का सवाल है कि यदि वेतन भुगतान या कार्य परिस्थितियों से संबंधित शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं तो नगर निगम प्रशासन को इसकी जांच कराकर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए।
अब रिकॉर्ड की जांच से सामने आ सकती है पूरी तस्वीर
पूरे मामले में अब उपस्थिति रजिस्टर,ड्यूटी आदेश, कर्मचारियों की वास्तविक संख्या,वेतन भुगतान रिकॉर्ड, बैंक भुगतान,अनुबंध की शर्तें और मतदान सामग्री उतारने के दौरान मौजूद कर्मचारियों की जानकारी की जांच महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
यदि रिकॉर्ड में निर्धारित कर्मचारियों और वास्तविक उपस्थिति के बीच अंतर सामने आता है,तो आउटसोर्स व्यवस्था की निगरानी और ठेका एजेंसी की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं।
सवाल सिर्फ कर्मचारियों का नहीं,पूरी आउटसोर्स व्यवस्था का
अल्ट्रा क्लीन कंपनी से जुड़े विवाद अब केवल वेतन भुगतान तक सीमित नहीं दिखाई दे रहे हैं।कर्मचारियों की कथित नाराजगी,कार्यस्थल पर उनकी उपलब्धता और नगर निगम की निगरानी व्यवस्था ने पूरी आउटसोर्स प्रणाली को सवालों के घेरे में ला दिया है।
अब देखना होगा कि नगर निगम प्रशासन इस पूरे मामले में कर्मचारियों की वास्तविक संख्या,उपस्थिति,भुगतान और निजी श्रमिकों के इस्तेमाल की जांच कराता है या नहीं।निष्पक्ष जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि विवाद के पीछे वास्तविक कारण क्या हैं और जिम्मेदारी किसकी बनती है।
सबसे बड़ा सवाल
अगर आउटसोर्स एजेंसी को कर्मचारियों की उपलब्धता के लिए भुगतान किया जा रहा है,तो महत्वपूर्ण सरकारी कार्य के दौरान निजी श्रमिकों की जरूरत क्यों पड़ी?और यदि कर्मचारी वेतन भुगतान से नाराज होकर काम से दूरी बना रहे हैं,तो उनकी शिकायतों की सुनवाई आखिर कब होगी?
