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कागज़ों में 100 कर्मचारी,मैदान में दिखे सिर्फ 50!अल्ट्रा क्लीन कंपनी की कथित सूची से मचा हड़कंप...

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कागज़ों में 100 कर्मचारी,मैदान में दिखे सिर्फ 50!अल्ट्रा क्लीन कंपनी की कथित सूची से मचा हड़कंप...

डायरेक्टर मुकेश कालवे और जीएम विकास रजक पर फिर उठे सवाल,जांच हुई तो खुल सकते हैं बड़े राज

EXCLUSIVE |अमित तिवारी की रिपोर्ट जबलपुर
नगर निगम जबलपुर की आउटसोर्स एजेंसी अल्ट्रा क्लीन कंपनी एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है।इस बार विवाद की वजह बनी है अतिक्रमण विभाग से जुड़ी एक कथित कर्मचारी सूची,जिसमें लगभग 100 कर्मचारियों के नाम दर्ज बताए जा रहे हैं।वहीं,विभागीय सूत्रों और कर्मचारियों का दावा है कि मैदान में नियमित रूप से काम करते हुए मुश्किल से 50 कर्मचारी ही दिखाई देते हैं।

यदि ये दावे सही साबित होते हैं,तो यह मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि सरकारी धन के दुरुपयोग और फर्जी उपस्थिति के जरिए वेतन निकासी जैसे गंभीर सवाल खड़े कर सकता है।

कर्मचारियों का दावा—"इन नामों के लोगों को जानते तक नहीं"

विभाग में कार्यरत कई कर्मचारियों ने पहचान उजागर न करने की शर्त पर दावा किया कि सूची में शामिल कई नाम ऐसे हैं जिन्हें उन्होंने कभी फील्ड में काम करते नहीं देखा।कुछ कर्मचारियों का कहना है कि"हम इस नाम के लोगों को जानते तक नहीं हैं,काम करना तो बहुत दूर की बात है।"

इन दावों ने इस आशंका को जन्म दिया है कि कहीं सूची में दर्ज कुछ नाम केवल कागज़ों तक सीमित तो नहीं हैं।

क्या फर्जी अटेंडेंस के जरिए निकल रहा है वेतन?

सूत्रों का दावा है कि कथित सूची में शामिल कई कर्मचारियों की उपस्थिति संदिग्ध है और यदि रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच की जाए तो वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।हालांकि,इन आरोपों की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और जांच के बाद ही तथ्यों की पुष्टि संभव होगी।

जांच हुई तो खुल सकते हैं कई बड़े राज

अब मांग उठ रही है कि नगर निगम प्रशासन सूची में दर्ज प्रत्येक कर्मचारी का—

•उपस्थिति रिकॉर्ड,

•वास्तविक कार्यस्थल,

•वेतन भुगतान का विवरण,

•तैनाती संबंधी दस्तावेज

सार्वजनिक कर निष्पक्ष जांच कराए, ताकि सच्चाई सामने आ सके।

पहले भी विवादों में रही है कंपनी

अल्ट्रा क्लीन कंपनी के डायरेक्टर मुकेश कालवे और जनरल मैनेजर विकास रजक को लेकर पहले भी कर्मचारियों के वेतन, ईपीएफ और श्रमिक अधिकारों से जुड़े विभिन्न आरोपों की शिकायतें सामने आ चुकी हैं। संबंधित मामलों में कुछ शिकायतों पर जांच की प्रक्रिया भी शुरू होने की जानकारी सामने आई है। इन आरोपों पर संबंधित पक्ष का विस्तृत जवाब सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।

सबसे बड़ा सवाल?

यदि कथित सूची सही है तो नगर निगम के रिकॉर्ड और जमीनी हकीकत में इतना बड़ा अंतर कैसे है? और यदि सूची भ्रामक है तो प्रशासन इसकी आधिकारिक स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं करता?

अब निगाहें नगर निगम प्रशासन और संबंधित जांच एजेंसियों पर हैं। निष्पक्ष जांच ही तय करेगी कि मामला केवल चर्चाओं तक सीमित है या वास्तव में आउटसोर्स व्यवस्था में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं।

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