मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने पॉक्सो मामले में दोषसिद्धि की निरस्त, अपीलकर्ता दोषमुक्त
विकास की कलम जबलपुर, 6 जुलाई 2026।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर की खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में पॉक्सो अधिनियम के तहत दोषसिद्ध एक अपीलकर्ता को राहत प्रदान करते हुए उसकी दोषसिद्धि एवं दंडादेश को निरस्त कर दिया। माननीय न्यायमूर्ति श्री विवेक अग्रवाल एवं माननीय न्यायमूर्ति श्री अवनींद्र कुमार सिंह की पीठ ने आपराधिक अपील क्रमांक 827/2026 मुकेश पंड्रो बनाम मध्य प्रदेश राज्य में यह फैसला सुनाते हुए अपील स्वीकार कर ली।
प्रकरण के अनुसार, विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो अधिनियम), डिंडौरी द्वारा सत्र प्रकरण क्रमांक 23/2024 में दिनांक 27 नवंबर 2025 को पारित निर्णय के तहत अपीलकर्ता मुकेश पंड्रो को भारतीय दंड संहिता की धारा 363 एवं 366 तथा पॉक्सो अधिनियम की धारा 5(L)/6 के अंतर्गत दोषी ठहराया गया था। न्यायालय ने पहले एवं दूसरे अपराध के लिए पांच-पांच वर्ष के सश्रम कारावास तथा पॉक्सो अधिनियम के अपराध के लिए 20 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी।
उच्च न्यायालय में अपीलकर्ता की ओर से यह तर्क रखा गया कि पीड़िता घटना के समय वयस्क थी तथा अपनी स्वेच्छा से अपीलकर्ता के साथ गई थी। यह भी बताया गया कि पीड़िता ने स्वयं अपीलकर्ता के विरुद्ध कार्यवाही जारी रखने की इच्छा व्यक्त नहीं की, क्योंकि दोनों के बीच पारस्परिक सहमति से संबंध थे।
सुनवाई के दौरान पीड़िता की आयु से संबंधित अभिलेखों की विस्तृत जांच की गई। न्यायालय ने पाया कि प्रस्तुत जन्म प्रमाण-पत्र घटना के लगभग 11 वर्ष बाद वर्ष 2018 में तैयार कराया गया था, जिससे उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न उत्पन्न हुआ। वहीं, अभियोजन साक्षी क्रमांक-2, जो पीड़िता की माता थीं, ने अपने बयान में बताया कि उन्होंने पीड़िता का प्रथम कक्षा में प्रवेश सात से आठ वर्ष की आयु में कराया था। इस साक्ष्य को न तो अभियोजन द्वारा चुनौती दी गई और न ही उन्हें पक्षद्रोही घोषित कर पुनः परीक्षण किया गया।
उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उच्च न्यायालय ने पीड़िता का जन्म वर्ष 2005 माना और यह निष्कर्ष निकाला कि फरवरी 2024 में घटना के समय उसकी आयु 18 वर्ष से अधिक थी। न्यायालय ने अभिलेख पर उपलब्ध डीएनए रिपोर्ट (प्रदर्श पी-31) पर भी विचार किया, जो अपीलकर्ता के पक्ष में सहायक पाई गई।
खंडपीठ ने अपने निर्णय में कहा कि अभियोजन पक्ष यह सिद्ध करने में असफल रहा कि घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी। ऐसे में विचारण न्यायालय द्वारा पारित दोषसिद्धि एवं दंडादेश विधि की कसौटी पर टिकने योग्य नहीं है और उसे कायम नहीं रखा जा सकता।
इसी आधार पर उच्च न्यायालय ने अपील स्वीकार करते हुए दोषसिद्धि एवं सजा के आदेश को अपास्त कर दिया। न्यायालय ने निर्देश दिया कि यदि अपीलकर्ता किसी अन्य प्रकरण में आवश्यक न हो, तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।
अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्री शीर्ष अग्रवाल एवं श्री शिवम कछावाहा ने प्रभावी ढंग से पैरवी करते हुए अपने तर्क प्रस्तुत किए। वहीं, राज्य शासन की ओर से शासकीय अधिवक्ता श्री मानस मणि वर्मा ने पक्ष रखा। यह निर्णय पॉक्सो मामलों में पीड़िता की आयु के निर्धारण एवं साक्ष्यों के मूल्यांकन के संबंध में एक महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टांत के रूप में देखा जा रहा है।
