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Exclusive:अल्ट्रा क्लीन को दोबारा ठेका दिलाने की कोशिश?35 कंपनियों की टेंडर दौड़ में शपथ पत्र बना बड़ा सवाल

जबलपुर न्यूज़ / नगर निगम / मध्य प्रदेश

अल्ट्रा क्लीन को दोबारा ठेका दिलाने की कोशिश?35 कंपनियों की टेंडर दौड़ में शपथ पत्र बना बड़ा सवाल

नगर निगम की आउटसोर्स टेंडर प्रक्रिया पर उठे सवाल, प्रतिभागियों ने समान जानकारी नहीं मिलने का लगाया आरोप

जबलपुर।नगर निगम जबलपुर में आउटसोर्स कर्मचारियों की आपूर्ति के लिए जारी टेंडर प्रक्रिया विवादों में घिरती नजर आ रही है।करीब 35 कंपनियों के टेंडर प्रक्रिया में शामिल होने के बीच शपथ पत्र को लेकर उठे सवालों ने पूरी तकनीकी जांच की पारदर्शिता पर बहस छेड़ दी है।कुछ प्रतिभागियों का दावा है कि उन्हें शपथ पत्र से संबंधित स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई थी, जबकि अब इसी दस्तावेज को तकनीकी पात्रता के परीक्षण में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

मामले में आरोप लगाए जा रहे हैं कि तकनीकी छंटनी के जरिए कुछ कंपनियों को बाहर कर किसी विशेष कंपनी के लिए रास्ता आसान किया जा सकता है।हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और नगर निगम का पक्ष सामने आना बाकी है।

35 कंपनियां मैदान में,क्या सभी को मिली थी समान जानकारी?

टेंडर प्रक्रिया में लगभग 35 प्रतिभागियों के शामिल होने की बात सामने आ रही है।ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि सभी कंपनियों को टेंडर की शर्तों,आवश्यक दस्तावेजों और शपथ पत्र के प्रारूप की जानकारी समान रूप से उपलब्ध कराई गई थी या नहीं।

प्रतिभागियों का कहना है कि यदि शपथ पत्र ऐसा अनिवार्य दस्तावेज था,जिसकी अनुपस्थिति में किसी कंपनी को तकनीकी रूप से अयोग्य घोषित किया जा सकता है,तो इसकी स्पष्ट जानकारी टेंडर जारी होने के समय ही सभी आवेदकों को मिलनी चाहिए थी।

टेंडर भरवाने के बाद शपथ पत्र बना तकनीकी छंटनी का आधार?

विवाद का सबसे अहम बिंदु यही बताया जा रहा है।आरोप है कि कुछ कंपनियों ने टेंडर प्रक्रिया में भाग लेते हुए दस्तावेज जमा किए,लेकिन उन्हें शपथ पत्र की अनिवार्यता के संबंध में स्पष्ट जानकारी नहीं थी।

अब यदि तकनीकी परीक्षण के दौरान इसी आधार पर कंपनियों को बाहर किया जाता है,तो यह जांच का विषय होगा कि:

•क्या शपथ पत्र अनिवार्य दस्तावेज था?

•क्या इसका प्रारूप पहले से उपलब्ध कराया गया था?

•क्या सभी 35 प्रतिभागियों को इसकी जानकारी समान रूप से दी गई?

•क्या दस्तावेजों की कमी के लिए सभी कंपनियों पर समान नियम लागू होंगे?

•तकनीकी समिति ने पात्रता तय करने के लिए कौन से मापदंड अपनाए?

इन सवालों के जवाब टेंडर प्रक्रिया की निष्पक्षता को स्पष्ट कर सकते हैं।

अल्ट्रा क्लीन कंपनी को फायदा पहुंचाने का आरोप

पूरे मामले में अल्ट्रा क्लीन कंपनी का नाम भी चर्चा के केंद्र में है।कुछ प्रतिभागियों और कर्मचारियों की ओर से आरोप लगाए जा रहे हैं कि तकनीकी दस्तावेजों की छंटनी के माध्यम से प्रतिस्पर्धी कंपनियों को बाहर करने की कोशिश की जा सकती है,जिससे अल्ट्रा क्लीन कंपनी के लिए दोबारा ठेका हासिल करने का रास्ता आसान हो।

हालांकि यह फिलहाल आरोप है,जिसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।इसलिए पूरे मामले में दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच और संबंधित पक्षों का पक्ष सामने आना बेहद जरूरी है।

अर्जुन यादव की भूमिका पर भी उठे सवाल

टेंडर प्रक्रिया को लेकर सहायक स्वास्थ्य अधिकारी अर्जुन यादव की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।कुछ आउटसोर्स कर्मचारियों ने आरोप लगाया है कि अर्जुन यादव का अल्ट्रा क्लीन कंपनी से पेटी कांट्रेक्टर के तौर पर संबंध रहा है।

यदि यह आरोप सही पाया जाता है तो टेंडर प्रक्रिया में उनकी भूमिका को लेकर हितों के संभावित टकराव का सवाल उठ सकता है।इसलिए नगर निगम को स्पष्ट करना चाहिए कि टेंडर प्रक्रिया में अर्जुन यादव की आधिकारिक भूमिका क्या है और क्या किसी प्रतिभागी कंपनी से उनके व्यावसायिक संबंध हैं।

इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।

देवेंद्र चौहान और अमित दुबे की भूमिका की जांच की मांग

टेंडर प्रक्रिया से जुड़े अतिरिक्त स्वास्थ्य अधिकारी देवेंद्र सिंह चौहान और कार्यालय अधीक्षक अमित कुमार दुबे की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।

प्रतिभागियों की मांग है कि तकनीकी परीक्षण की पूरी प्रक्रिया रिकॉर्ड पर लाई जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि प्रत्येक कंपनी के दस्तावेजों का परीक्षण एक समान नियमों के तहत किया गया या नहीं।

अगर किसी कंपनी को दस्तावेज की कमी के कारण अपात्र किया जाता है,तो उसी प्रकार की कमी वाली अन्य कंपनियों पर भी समान निर्णय होना चाहिए।

मुकेश कालवे और विकास रजक पर भी आरोप

अल्ट्रा क्लीन कंपनी के डायरेक्टर मुकेश कालवे और जनरल मैनेजर विकास रजक पर भी टेंडर को लेकर सेटिंग के आरोप लगाए जा रहे हैं।हालांकि इन आरोपों की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

ऐसे में आरोपों के बजाय अब दस्तावेज ही सबसे महत्वपूर्ण होंगे।यदि कंपनी ने नियमों के अनुरूप टेंडर में हिस्सा लिया है और सभी शर्तें पूरी की हैं तो रिकॉर्ड से स्थिति स्वतः स्पष्ट हो सकती है।

किन दस्तावेजों से खुल सकता है पूरा मामला?

टेंडर विवाद की निष्पक्ष पड़ताल के लिए निम्न दस्तावेज महत्वपूर्ण हो सकते हैं—

1.मूल निविदा की शर्तें

2.शपथ पत्र का निर्धारित प्रारूप

3.टेंडर पोर्टल पर उपलब्ध दस्तावेज

4.सभी प्रतिभागियों को जारी निर्देश और स्पष्टीकरण

5.35 कंपनियों द्वारा जमा किए गए दस्तावेज

6.तकनीकी परीक्षण की पूरी शीट

7.पात्र और अपात्र कंपनियों की सूची

8.अपात्र करने के कारण

9.तकनीकी समिति की नोटशीट

10.अधिकारियों द्वारा लिए गए निर्णय का रिकॉर्ड

इन दस्तावेजों के मिलान से यह पता लगाया जा सकता है कि शपथ पत्र की शर्त सभी प्रतिभागियों के लिए पहले से स्पष्ट थी या नहीं।

अब नगर निगम के सामने सबसे बड़ा सवाल

यह मामला सिर्फ एक कंपनी को ठेका मिलने या नहीं मिलने तक सीमित नहीं है।सवाल यह है कि 35 कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा वाली निविदा प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और समान नियमों पर आधारित है।

यदि सभी प्रतिभागियों को समान जानकारी दी गई और सभी पर एक जैसे नियम लागू किए गए हैं तो विवाद काफी हद तक समाप्त हो सकता है।लेकिन यदि दस्तावेजों की जांच में अलग-अलग कंपनियों के लिए अलग-अलग मापदंड अपनाए गए, तो पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठना स्वाभाविक है।

अब फाइल बताएगी—किसे मिला मौका और किसे दिखाया रास्ता?

अल्ट्रा क्लीन कंपनी को दोबारा ठेका दिलाने के आरोपों के बीच अब नगर निगम की तकनीकी जांच सबसे महत्वपूर्ण हो गई है। क्या 35 कंपनियों को समान जानकारी दी गई थी?क्या शपथ पत्र की अनिवार्यता पहले से स्पष्ट थी?क्या सभी कंपनियों के दस्तावेजों की जांच एक ही नियम से हुई?

इन सवालों का जवाब आरोपों से नहीं,बल्कि टेंडर फाइल, तकनीकी परीक्षण और आधिकारिक रिकॉर्ड से सामने आएगा।

नोट: इस रिपोर्ट में अधिकारियों और कंपनी से जुड़े व्यक्तियों के संबंध में लगाए गए आरोपों को आरोप के रूप में ही प्रस्तुत किया गया है।संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष मिलने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जायेगा।

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