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गनीमत है कि डेंगू का मच्छर पढ़ा लिखा है.. वरना जान ही नहीं पता कि वो कागजों में मर चुका है..



गनीमत है कि डेंगू का मच्छर पढ़ा लिखा है..
वरना जान ही नहीं पता कि वो कागजों में मर चुका है..




विकास की कलम/संपादकीय

आज तक आपने मच्छरों के खून चूसने की दास्तान बहुत बार पढ़ी होगी..
लेकिन आज हम आपको सरकारी विभाग के कुछ ऐसे खून चूसू पिस्सू से मुखातिब कराएंगे..
जिन्होंने मच्छरों का खून चूस कर ही अपना पेट भर लिया..

तो गौर फरमाइए...
विकास की कलम के अनोखे अंदाज में..
विभागीय अधिकारियों की काली करतूत का सफरनामा..


इस साल सावन 2 माह का और उसके बाद भादों का मानसून.. इस बार डेंगू परिवार के लिए काफी खुशियां लेकर आया है। नालियां बजबजा रही है और जहां देखो वहां पानी भरा है। अपनी हर वर्ष की परंपरा का प्रतिपादन करते हुए डेंगू परिवार ने इस वर्ष भी पूरे शहर का भ्रमण किया। इस दौरान उसने न केवल शहर बल्कि ग्रामीण इलाकों में भी घूम-घूम कर डेंगू परिवार के नए सदस्यों को शिकार की जगह दिखाई।

परिवार के साथ उड़ते उड़ते एक युवा डेंगू मच्छर ने अपने परिवार के मुखिया से कहा..
दादा जी आप तो अक्सर बड़ी-बड़ी डींगें हांकते थे । आप कहते थे कि देखना जब हम शिकार के लिए शहर भ्रमण पर निकलेंगे तो हमारी खौफ की दहशत पूरे शहर में दिखाई देगी। कहीं पंपलेट, तो कहीं पोस्टर के माध्यम से हमसे बचने की सलाह दी जाएगी। नालियों में दवा छिड़काव होगा। पूरा शहर दोनों टाइम फॉगिंग मशीन के धुएं से सराबोर होगा।
लेकिन इधर तो ऐसा माहौल है मानो किसी को हमसे कोई सरोकार नहीं है।


परिवार के छोटे बच्चे की बात सुनकर मुखिया का दिल पसीच गया। और अपने फाइनल शिकार पर निकलने से पहले मलेरिया विभाग के कार्यालय में अपनी आमद दर्ज कराई। 
सीढ़ियां चढ़कर कार्यालय पहुंचा बुजुर्ग डेंगू .. घंटों तक साहब का इंतजार करता रहा।जैसे तैसे उसकी साहब के एक खास मुलाजिम से मुलाकात हो ही गयी। अपनी व्यथा और परिवार से मिली जिल्लत की कहानी सुनाते हुए उसने पूछा।

क्या इस बार डेंगू-मलेरिया के ख़ौफ़ से शहर को कोई सरोकार नहीं है। चलो माना शहर जागरूक है लेकिन कम से कम गावों में तो हमारी इज्जत ढांक देते। जो सालों से दीवारों पर समझाइश पुती है। उसी पर एक बार फिर से चूना मार देते।

बुजुर्ग डेंगू की बात पर उसे फटकारते हुए बाबू ने उसे इस साल की डेंगू आईईसी की फाइल दिखाई।
जहां उसे शहर से समाप्त कर देने के लिए लाखों का बिल पहले ही लगाया जा चुका था। पूरे शहर में बैनर पोस्टर और जागरूकता रैली के जरिये उसकी शव यात्रा भी निकाली जा चुकी थी।

एक आभासी पोस्टर तो कलेक्टर के सीने में भी गाड़ा जा चुका था।
 बाबू ने कहा..देखो इस बार तो फॉगिंग मशीन इतनी ज्यादा चली है कि उसके धुएं से फाइल के पन्ने तक काले हो गए है

बाबू ने डेंगू को समझाया कि..
बेटा तुम कागजों पर मर चुके हो..
और तुम्हारी इस साल की मौत पर लाखों खर्च भी किये जा चुके है।
अब अगर तुम दोबारा शहर में दिखाई दोगे..तो देश द्रोही कहलाओगे।

तुम्हारी भलाई इसी में है कि इस बार अपने परिवार को लेकर चुपचाप कहीं एकांत में बैठ जाओ..अगली साल जब तुम्हारी मौत का उत्सव मनाएंगे तो तुम्हारे बच्चों की खुशी की खातिर एक दो पोस्टर जरूर लगाएंगे।

विभाग की भूंख और शहर की दुर्दशा से आहत उस मुखिया ने पूरे जिले का चक्कर लगाया और अपनी मौत के जश्न से जुड़े निशान खोजने लगा। लेकिन विभागीय फाइलों के अलावा पूरे शहर में डेंगू निवारण के कोई इंतजाम नहीं मिले।


सुना है..थक हार कर अब उसने कलेक्टर को चाबने का मन बनाया है। और अगर बात न बनी तो मामा शिवराज को भी काट कर आएगा।


कहते है..मलेरिया विभाग से निकला डेंगू परिवार का मुखिया आज तक लापता है।

अब सवाल यह है कि सरकारी कागजों में दर्ज अपनी फर्जी मौत को पढ़कर क्या डेंगू वाकई डर चुका है..


गनीमत है कि डेंगू का मच्छर पढ़ा लिखा है..
वरना जान ही नहीं पता कि वो कागजों में मर चुका है..


नोट- विकास की कलम अपने पाठकों से अनुरोध करती है कि हमारे इस कटाक्ष लेखों में अपनी प्रतिक्रिया जरूर दर्ज कराए..साथ ही ऐसे लेखों को जिम्मेदार अधिकारी एवं जनप्रतिनिधियों के साथ जमकर साझा करें...
ध्यान रहे..
एक पत्रकार अपनी निष्पक्ष लेखनी से अपना दायित्व पूरा कर रहा है..जिसे आगे बढ़ाना आपकी जिम्मेदारी है..






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