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अल्ट्रा क्लीन कंपनी के खिलाफ खुलकर सामने आए आउटसोर्स कर्मचारी,राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग पहुंची शिकायत;वेतन,टेंडर और भुगतान व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
स्वास्थ्य,उद्यान और अतिक्रमण शाखा के कर्मचारियों ने लगाया कम वेतन,श्रमिक अधिकारों के उल्लंघन और टेंडर प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं का आरोप;बैंक रिकॉर्ड,टेंडर फाइल और भुगतान दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच की मांग
जबलपुर।नगर निगम जबलपुर की आउटसोर्स व्यवस्था एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गई है।इस बार मामला सीधे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक पहुंच गया है।स्वास्थ्य,उद्यान और अतिक्रमण शाखा में कार्यरत सैकड़ों आउटसोर्स कर्मचारियों ने ठेका एजेंसी अल्ट्रा क्लीन एंड केयर के खिलाफ सामूहिक शिकायत भेजते हुए आरोप लगाया है कि उन्हें लंबे समय से शासन द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन से कम भुगतान किया गया।कर्मचारियों ने यह भी आरोप लगाया है कि वेतन भुगतान,वैधानिक लाभ और टेंडर प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं,जिनकी स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए।
शिकायत में कंपनी के डायरेक्टर मुकेश कालवे,जनरल मैनेजर विकास रजक तथा नगर निगम के अतिरिक्त स्वास्थ्य अधिकारी देवेंद्र सिंह चौहान की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं।हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल नहीं हुई है और मामले की आधिकारिक जांच होना शेष है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से की व्यापक जांच की मांग
कर्मचारियों द्वारा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो को भेजी गई शिकायत में मांग की गई है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए।शिकायतकर्ताओं का कहना है कि जांच केवल कागजी रिकॉर्ड तक सीमित न रहे, बल्कि बैंक भुगतान,अनुबंध,उपस्थिति रजिस्टर और अन्य वित्तीय दस्तावेजों की भी बारीकी से जांच हो।
उनका कहना है कि यदि सभी रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच की जाती है,तो वास्तविक भुगतान और कर्मचारियों को मिले वेतन का पूरा सच सामने आ सकता है।
कम वेतन देने का आरोप,करोड़ों की संभावित वित्तीय अनियमितता का दावा
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि कई कर्मचारियों के बैंक खातों में प्रतिमाह लगभग 7 हजार रुपये ही जमा किए गए, जबकि लागू न्यूनतम वेतन इससे अधिक था। कर्मचारियों का दावा है कि प्रत्येक कर्मचारी को हर महीने औसतन 4 हजार रुपये तक का आर्थिक नुकसान हुआ।
शिकायत में यह भी दावा किया गया है कि यदि सभी प्रभावित कर्मचारियों के भुगतान का आकलन किया जाए तो संभावित वित्तीय अनियमितता करीब 1.25 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है।हालांकि इस दावे की पुष्टि किसी आधिकारिक जांच रिपोर्ट से अभी नहीं हुई है।
बैंक स्टेटमेंट से लेकर टेंडर फाइल तक मंगाने की मांग
शिकायत में आयोग से अनुरोध किया गया है कि नगर निगम, संबंधित बैंक,श्रम विभाग,ईपीएफ संगठन,ईएसआईसी तथा अन्य संबंधित विभागों से निम्न दस्तावेज तलब किए जाएं—
•कर्मचारियों के बैंक स्टेटमेंट
•आरटीजीएस और भुगतान रिकॉर्ड
•वेतन रजिस्टर
•बायोमेट्रिक एवं उपस्थिति रजिस्टर
•ईपीएफ एवं ईएसआईसी जमा रिकॉर्ड
•टेंडर फाइल और अनुबंध दस्तावेज
•भुगतान स्वीकृति से जुड़े अभिलेख
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि इन दस्तावेजों की जांच से यह स्पष्ट हो सकेगा कि भुगतान नियमों के अनुसार हुआ या नहीं।
'यह केवल वेतन नहीं,श्रमिक सम्मान का भी सवाल'
कर्मचारियों का कहना है कि यह मामला केवल कम वेतन का नहीं बल्कि श्रमिकों के सम्मान, सामाजिक सुरक्षा और उनके संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा हुआ है। उनका आरोप है कि यदि श्रम कानूनों और अनुबंध की शर्तों का सही तरीके से पालन होता, तो उन्हें इस तरह शिकायत करने की नौबत नहीं आती।
उन्होंने आयोग से दोषी पाए जाने पर संबंधित एजेंसी और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की भी मांग की है।
बकाया वेतन और वैधानिक लाभ दिलाने की मांग
शिकायतकर्ताओं ने मांग की है कि जांच पूरी होने के बाद सभी प्रभावित कर्मचारियों को उनका बकाया वेतन,ईपीएफ, ईएसआईसी तथा अन्य वैधानिक लाभ ब्याज सहित दिलाए जाएं।साथ ही भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने,इसके लिए जिम्मेदारी भी तय की जाए।
नगर निगम में बढ़ी हलचल,जांच पर टिकी निगाहें
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक मामला पहुंचने के बाद नगर निगम के प्रशासनिक गलियारों में इस प्रकरण को लेकर चर्चा तेज हो गई है।यदि आयोग शिकायत पर संज्ञान लेकर विस्तृत जांच के आदेश देता है,तो वेतन भुगतान व्यवस्था,आउटसोर्स प्रणाली,टेंडर प्रक्रिया और संबंधित अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आयोग इस शिकायत पर क्या कदम उठाता है और नगर निगम प्रशासन आरोपों के संबंध में क्या आधिकारिक जवाब देता है।
