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केदारनाथ में सच होगा दुनिया के सबसे बड़े रोप-वे का सपना

केदारनाथ में सच होगा दुनिया के सबसे बड़े रोप-वे का सपना



मोदी है तो मुमकिन है यह सिर्फ जुमला नहीं बल्कि हकीकत का रूप लेते हुए अपने आप को सिद्ध करते जा रहा है मोदी ने शासन काल में कई जटिल से जटिल समस्याओं का चुटकी बजाकर निपटारा कर दिया है चाहे वह धारा 370 है या फिर राम मंदिर निर्माण नामुमकिन से भी लगने वाले कार्य मोदी ने मुमकिन का दिखाएं हैं सरदार बल्लभ भाई पटेल की सबसे ऊंची मूर्ति बनने के बाद अब दुनिया के सबसे बड़े रोपवे का सपना भी जल्द ही साकार होने वाला है।


देश में पहली बार सबसे बड़े रोप-वे के सपने को साकार करने के लिए उत्तराखंड सरकार ने कवायद शुरू भी कर दी है। आपको बता दें कि समुद्र तल से 11,500 फीट की ऊंचाई पर 11.5 किलोमीटर लंबा रोप-वे उत्तराखंड के चार धामों में से एक केदारनाथ धाम में बनेगा।


करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और बाबा केदारनाथ के आशीर्वाद के साथ ही इस सबसे लंबे रोपवे की रूपरेखा तैयार की जा रही है इस रोपवे के बनने के बाद तीर्थ यात्रियों को 12 घंटे की कष्ट दाई दुर्लभ यात्रा से राहत मिलेगी। प्राप्त जानकारी के अनुसार जिस तीर्थ यात्रा के लिए श्रद्धालुओं को करीब पूरा दिन लगाना पड़ता था। वह अब सिर्फ एक घंटे में संपन्न हो सकेगी।


अभी गौरीकुंड से केदारनाथ धाम तक श्रद्धालुओं को 16 किलोमीटर का सफर करना होता है, जिसमें पूरा दिन लग जाता है, लेकिन सोनप्रयाग से केदारनाथ तक रोप-वे बनने से यह सफर सिर्फ एक घंटे में तय हो जाएगा.


पीएम मोदी ने केदारनाथ दौरे के दौरान की थी घोषणा



इस रोप-वे को लेकर 5 नवंबर के अपने केदारनाथ दौरे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि केदारनाथ और हेमकुंड साहिब में रोप-वे काम जल्द शुरू होगा. पीएम मोदी की घोषणा के बाद से ही विभाग अलर्ट मोड पर आ गया था और गुपचुप तरीके से ब्लूप्रिंट और आगे की कार्यवाही भी दबे शब्दों में शुरू हो चुकी थी लेकिन अब इसे लेकर प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।


उत्तराखंड पर्यटन सचिव दिलीप जावलकर के हवाले से एक रिपोर्ट में कहा गया कि केदारनाथ रोप-वे प्रोजेक्ट को लेकर विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार किए जाने के लिए कवायद शुरू हो गई है और जल्द ही टेंडर भी निकाले जाएंगे.

पहले इस रोप-वे को लेकर प्लान कुछ इस तरह था कि इसे गौरीकुंड से केदारनाथ मंदिर तक बनाया जाए लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक बाद में इस प्रोजेक्ट को गौरीकुंड की जगह सोनप्रयाग से शुरू करने का फैसला किया गया ताकि ज़्यादा से ज़्यादा श्रद्धालुओं को इसका लाभ मिल सके।