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शुक्रवार, 20 नवंबर 2020

गाय-गोहरी-उत्सव.. मन्नत पूरी करवाने खुद को रौंदवाते है.. गायों से जानिए क्या है ये.. अनोखी परंपरा..

गाय-गोहरी-उत्सव..

मन्नत पूरी करवाने 

खुद को रौंदवाते है.. गायों से

जानिए क्या है ये.. अनोखी परंपरा..




हिंदू संस्कृति की  सबसे अनोखी बात यह है कि वह अपनी सभी परंपराओं में पशुओं को सम्मान और उनके प्रति अपनी कृतज्ञता दर्शाता है यही कारण है कि हमारी यह संस्कृति विदेशों तक में अपनी धाक जमा चुकी है वसुधैव कुटुंबकम के मार्ग में चलने वाले हमारे रीति रिवाजों मैं अक्सर पशुओं के प्रति प्यार और समर्पण के दृश्य देखने को मिल ही जाते हैं वैसे तो ऐसी कई रितियाँ और परंपरा पूरे हिंदुस्तान में फैली हुई है। जिन्हें बकायदा एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। आज के इस लेख में हम ऐसे ही एक अंगूठी परंपरा के विषय में जानेंगे जहां बाकायदा एक अनुष्ठान के तहत अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए लोग खुद को गायों से रौंदवाते हैं।


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क्या है परंपरा कहां होता है अनुष्ठान


इस अनूठे उत्सव को मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के बड़नगर तहसील में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है । जहां ग्राम भीडावद में दीपावली के दूसरे दिन एक बेहद खास परंपरा के तहत इसका आयोजन किया जाता है जिसे क्षेत्रीय ग्रामीण गाय गोहरी महोत्सव के नाम से मनाते हैं। इस महोत्सव को देखने के लिए देश के कोने-कोने से लोग पहुंचते हैं। परंपरा के तहत मन्नत पूरी होने पर आस्थावान लोग भूमि पर लेटते हैं और ऊनके ऊपर से दर्जनों गायें गुजरती हैं। इस दौरान ग्रामीणों द्वारा गौ माता के जयकारे लगाए जाते है।


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कोविड-19 के नियमों का पालन करते हुए रस्म निभाई




हालांकि कोरोना संक्रमण के कारण इस बार इस परंपरा को लेकर संशय की स्थिति थी, मगर ग्रामीणों ने कोविड-19 के नियमों का पालन करते हुए रस्म निभाई।  सुबह से ही भीड़ावद में मन्नतधारी आ चुके थे। कोरोना के कारण इस बार इनकी संख्या कम थी। गांव के मंदिर में पूजन के बाद गायों का श्रृंगार किया गया। फिर उन्हें मंदिर ले जाया गया। यहां पूजा-अर्चना हुई। फिर ग्रामीणों ने गोवर्धन और गोमाता के जयकारे लगाए। इसके बाद रस्म की शुरुआत हुई। बड़ी संख्या में मौजूद ग्रामीणों के बीच मन्नतधारी जमीन पर लेटे और देखते ही देखते उनके शरीर के ऊपर से कई गायें और गोवंश दौड़ते हुए निकल गए।


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वर्षों से चली आ रही परंपरा


गाय गोहरी पर्व मूलत: आदिवासी परंपरा है, मगर मालवांचल के कुछ गांवों में भी इसे मनाया जाता है। ग्राम भीड़ावद के रहवासी बताते हैं कि यह परंपरा वर्षों पुरानी है। बुजुर्ग बताते हैं कि पहले इस परंपरा में सैकड़ों हजारों की संख्या में को माताओं का काफिला श्रद्धालुओं के ऊपर से गुजरता था लेकिन धीरे-धीरे आधुनिकता के दौर में यह परंपरा लुप्त सी होती जा रही है। यह सिर्फ लोगों की गौ माता के प्रति आस्था और विश्वास का ही चमत्कार है कि आज भी यह रीति रिवाज मनाए जा रहे हैं और वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में कभी कोई दुर्घटना अथवा कोई घायल नहीं हुआ। ग्रामीण मानते हैं कि गोवर्धन और गोवंश से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है। मन्नत पूरी होने के बाद  आस्थावान इस रस्म में शामिल होते हैं।


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विकास की कलम

चीफ एडिटर

विकास सोनी

लेखक विचारक पत्रकार




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