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क्या आपने मनाया..?? देशी फ्रेंडशिप डे.. विकास की कलम पर जाने.. भुजरिया पर्व..से जुड़ी हर बात..

क्या आपने मनाया..??
देशी फ्रेंडशिप डे..
विकास की कलम पर जाने..
भुजरिया पर्व..से जुड़ी हर बात..

 भाई बहन के पवित्र पर्व रक्षाबंधन के अगले दिन मनाया जाने वाला भुजरिया (कजलिया) पर्व बेहद हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।। भुजरिया पर्व का मालवा, बुंदेलखंड और महाकौशल क्षेत्र में विशेष महत्व माना गया है। इसके लिए घरों में करीब एक सप्ताह पूर्व भुजरियां बोई जाती हैं। इस दिन भुजरियों को कुओं, ताल-तलैयों आदि पर जाकर निकालकर सर्व प्रथम भगवान को भेंट किया जाता है। इसके बाद लोग एक दूसरे से भुजरिया बदलकर अपनी भूल-चूक भुलाकर गले मिलते हैं।

बुंदेलखंड की संस्कृति से जुड़ा पर्व
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बुदेलखंड की लोक संसकृति जो बुलंदेखंड सहित महाकौशल, मध्‍य भारत, सहित उत्‍तर प्ररेश के कई इलाको में जीवंत है. भुजरिया पंरपरा बुंलंदखंड के ओरछा महोबा से करीब 500 साल पूर्व शुरू हुई है, बुन्देलखण्ड में कजलियां का त्यौहार बहुत जोर-शोर से मनाया जाता है क्योंकि कजलियां मूलत: बुंदेलखंड की एक परंपरा है जो कि पर्व के रूप में हमारे समाज में सम्मलित हो गई। इस क्षेत्र में यह लोकपरम्परा व बिश्वास का पर्व माना जाता है। हरे कोमल बिरवों को आदर और सम्मान के साथ भेंट करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। पहले कभी यह पर्व बड़े् ही उत्साह के साथ मनाया जाता था, परन्तु आधुनिकता की दौड़ में इस पर्व की रौनक फीकी पड़ती जा रही है। हालांकि कुछ ग्रामीण व शहरी इलाकों में  इस परम्परा को अभी भी लोग जीवित किए हुए हैं।

बुंदेलखंड की माटी की विरासत

यह त्यौहार विशेषरूप से खेती-किसानी से जुडा हुआ त्यौहार है। इस त्यौहार में विशेष रूप से घर-मोहल्ले की औरतें हिस्सा लेती हैं। सावन के महीना की नौमी तिथि से इसका अनुष्ठान शुरू हो जाता है। नाग पंचमी के दूसरे दिन अलग अलग खेतों से लाई गई मिट्टी को बर्तनों में भरकर उसमें गेहूं के बीज बो दिए जाते थे। औरतें मट्टी कौ गा-बजा कै पूजन करतीं हैं और उसके बाद में ‘नाउन’ ( नाइ की पत्नी ) से छोयले ( छुले ) के दोना मँगवा कै उसमें जा मट्टी रख देतीं हैं.
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एक सप्ताह बाद एकादशी की शाम को बीजों से तैयार कजलियों की पूजा की जाती है। फिर दूसरे दिन द्वादशी को सुबह उन्हे किसी जलाशय आदि के पास ले जाकर उन्हे मिट्टी से खुटक लिया जाता है, और सभी दोने को तलबा में विसर्जन कर देती हैं। खोंटीं हुई कजलियाँ सबको आदमियन-औरतों-बच्चों को बाँटी जातीं हैं और वे सब आदर से सर-माथै पै लगाती है। गेहूं की कोमल कजलियों को लड़कियों द्वारा परिवार के सदस्यों के कानों के ऊपर खोसकर टीका लगाती हैं।

नए दोस्त बनाने / रूठों को मनाने का विशेष पर्व
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रूठों को मनाने और नए दोस्त बनाने के लिए भी इस महोत्सव का विशेष महत्व है। संध्या के समय लोग सज-धजकर नए वस्त्र धारण कर इस त्यौहार का आनंद उठाते देखे जाते हैं। वहीं कई स्थानों पर विभिन्न क्षेत्रीय पार्टियों और दलों द्वारा विभिन्न स्थानों पर भुजरिया मिलन समारोह का आयोजन भी किया जाता है। भुजरिया पर्व को लेकर नगर-गांव की नदी, तालाबों पर महिलाओं की भारी भीड़ पहुंचती है। बच्चों में इस पर्व का खासा उत्साह देखा जाता है।

किन्नारों के लिए भुजरिया का महत्व
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भुजरिया पर्व को किन्नर समुदाय बड़ी ही धूम-धाम से मनाता है। इस दिन किन्नर सज-धजकर बड़ी की धूमधाम से जुलूस निकालते हैं। माना जाता है कि राजा भोज के शासनकाल में भोपाल में अकाल पड़ा था। उस समय बिल्कुल बारिश नहीं हुई थी और हर तरफ पानी को लेकर काफी परेशानी हो रही थी। उस वक्त यहां रहने वाले किन्नरों ने मंदिरों और मस्जिदों में जाकर बारिश के लिए प्रार्थना की थी। उनकी प्रार्थना के कारण कुछ समय बाद अच्छी बारिश हुई। इसी ख़ुशी में पहली बार यह पर्व मनाया गया था। तब से अब तक लगातार भोपाल में किन्नर हर साल भुजरिया पर्व मनाते आ रहे हैं।

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विकास की कलम
चीफ एडिटर
विकास सोनी
लेखक विचारक पत्रकार