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रविवार, 26 जुलाई 2020

CMHO की खामोशी बढ़ा रही.. झोला छाप डॉक्टरों का मनोबल.. जानकार बता रहे-लेनदेन का खेल

CMHO की खामोशी बढ़ा रही..
झोला छाप डॉक्टरों का मनोबल..
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कोरोना काल के आते ही गली कूचों में छुपे झोला छाप डॉक्टर कुकुरमुत्ते की तरह उभर के आ गए। बिना डिग्री /डिप्लोमा के खुद ही दवाखाना चलाने लगे। और फिर ग्राहकों की कमी भी तो नहीं है...
सर्दी जुखाम और बुखार के ढेरों मरीज लाइन लगाकर खुद इनके अड्डे पर खड़े है। ऐसे में घर आई लक्ष्मी को लौटाए कौन।
और फिर इस गोरखधंधे का कमीशन भी तो पहुँचाना है..???
आप को क्या लगता है...
बिना नज़राना दिए ही ..इतनी दिलेरी से यह काम खुले आम चल रहा है....
कहाँ जनाब यहां चोर चोर मौसेरे भाई है...
यकीन नहीं आता...तो आगे पढ़िए....

हमको मालूम है जमाने की हकीकत लेकिन..
दिल बहलाने के लिए "ग़ालिब"ख्याल अच्छा है.
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फर्जी डॉक्टरों पर नखेल कसेगी...
आमजन को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिलेगी...
झोलाछाप डॉक्टरों को जेल होगी...
लेकिन हकीकत और फ़साने में बहुत अंतर है जनाब...

झोलाछाप डॉक्टरों पर शिकंजा कसना इतना आसान नहीं है।कई आये और कई चले गए।लेकिन इनकी जड़ें हिला नहीं पाए। कभी कभार कोई गरीब जब इनके एक्सपेरिमेंट की भेंट चढ़ता है तो दिखावे के लिये कोई जिम्मेदार कार्यवाही कर देता है। कुछ दिन क्लिनिक बन्द रहती है। फिर अचानक चमत्कारिक ढंग से अड्डा पुनः आबाद हो जाता है। अब ये मत पूछना की पूजा कितने की लगी...
बस ये समझिए कि दो -तीन दिन की दिहाड़ी में मैनेज हो जाएगा...

हाल में ही हुई कार्यवाही-मामला हो गया सेट
अभी हाल ही कि बात है कि लॉक डाउन में स्वास्थ्य विभाग ने झोला छाप डॉक्टरों के कई ठिकानों पर दबिश दी। क्लिनिकों को सील बंद कर कार्यवाही की धौस दिखाई गयी। फिर उनसे दस्तावेज मंगाए गए।
फिर........
फिर क्या...इतने भी नासमझ मत बनिये..
फिर वही हुआ जो होता आया है..अगर आप सोच रहे है कि यह कार्यवाही कोई जनहित में हुई तो समझते रहिए..
जिनका जितना हित होना था हो गया...
और अब फिर से डॉक्टर साहब अपने क्लिनिक में बैठकर पूरी शान से डाक्टरी कर रहे है....
यही कारण है कि शहर से लेकर गांव के आखिरी छोर तक डिग्री रहित सैकड़ों झोलाछाप डॉक्टर अपना कारोबार चला रहे है। और MBBS की तर्ज पर एलोपैथी दवाएं लिख रहे है...
अब भगवान के लिए मत पूछियेगा दस्तावेजों का क्या....बड़ी मुश्किल से तो डिपार्टमेंट सेट हुआ है....

स्वास्थ्य विभाग बना..घोटालों का गढ़--कोर्ट के आदेश दबाकर डकार रहे मोटी पगार...

कार्यवाही के बाद बोर्ड हटा-डॉक्टर नहीं..

बीते दिनों हुए नर्मदा नगर गोहलपुर की दवा दुकान की कार्यवाही तो आपको याद ही होगी।जहां बड़े रुतबे के साथ स्वास्थ्य विभाग की टीम ने पहुंचकर अपना जलवा दिखाते हुए आनन-फानन में दवा-दुकान को सील किया था। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इतनी घनी आबादी में चलने वाला यह दवाखाना बिना किसी डिग्री के संचालित किया जा रहा था। अधिकारियों की भनक लगते ही मुख्य सरगना (झोलाछाप डॉक्टर)मौके से फरार हो गया था। उस पर तो बाकायदा FIR दर्ज करने की बात की गई थी। लेकिन फिर वही हुआ जिसका हमे अंदाजा ही नहीं बल्कि पूरा विश्वास था।
और आज फिर से दवाखाना आबाद है...
बस बोर्ड नही लगा है..

ऊपर से नीचे तक है पुख्ता सेटिंग..
अधिकारी हट सकता है..पर ये नहीं..

गौरतलब हो कि पूर्व CMHO मनीष कुमार मिश्रा ने भी झोलाछाप डॉक्टरों के इस रैकेट का भंडाफोड़ करने का जिम्मा उठाया था। जहां धड़ल्ले से कारवाही भी की गई थी। जनता को विश्वास हो चला था कि अब तो ये अधिकारी झोलाछाप डॉक्टरों की नाक में नखेल डाल कर ही दम लेगा। लेकिन सिस्टम तो पहले से ही संक्रमित है जनाब..एक अकेला कब तक इलाज कर पाता..लिहाजा झोलाछाप डॉक्टरों पर कार्यवाही मनीष मिश्रा के ओहदे को ही ले डूबी....
मुहिम ठंडे बस्ते में चली गयी...
और क्लिनिक फिर से अपने ढर्रे पर अनवरत चल रही है।


नए CMHO की खामोशी कहीं मूक सहमति तो नही..

अधिकारी बदले तो आदेश भी बदल गए। 
नए मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी रत्नेश कुरारिया के साथ अब एक नई पैनल नए तरीके से काम कर रही है। 
शुरुआत के समय तो सबकुछ ठीक चला लेकिन अचानक ही जानकारों को ये समझ आ गया कि नए CMHO साहब कई मामलों में खुद अपने निर्णय लागू नहीं कर पा रहे है। आते ही उन्होंने किसी और के इशारों पर सिफारशी लालों की भर्ती कर डाली।जिन्हें न तो अनुभव था और न ही योग्यता। इतना ही नहीं CMHO साहब तो दागी व्यकित की पैरवी कर उसे पदोन्नत करने की सिफारिश तक कलेक्टर से कर बैठे। बाद में मामले को मचते देख..आदेश वापस लिए गए।
सूत्र बताते है कि सिफारिशी-लालों की कारगुजारी के चलते झोलाछाप डॉक्टरों के विरुद्ध चलाया गया अभियान अचानक ही बंद करा दिया गया। गौरतलब हो कि एक जनहित याचिका के चलते यह कार्यवाही शुरू की गई थी।  लेकिन इतनी अहम मुहिम के रुक जाने के सवालों पर CMHO साहब की खामोशी...कई संदेहास्पद सवालों को जन्म देती है।

क्या BAMS लिख सकता है एलोपैथी की दवाएं..??

जबलपुर में BAMS डॉक्टर्स भी अब एलोपैथी की दवाएं धड़ल्ले से लिख कर मुनाफा कमा रहे है...डॉक्टरी पेशे में मानो बाहर से आ गयी है। हर चौथा आदमी सर्दी खांसी बुखार से पीढित आ ही जाता है। लेकिन कोरोना संक्रमण काल मे ऐसे डॉक्टरों का उपचार कितना फायदेमंद होगा..???
जबकि नियमो की माने तो..
स्वास्थय विभाग द्वारा जारी गाइडलाइन के अनुसार कोई चिकित्सक यदि अपनी पैथी के अलावा दूसरी पैथी से इलाज करता है तो वह ग़ैरकानूनी माना जाएगा।

नियमों की अनदेखी कर रहे BAMS डॉक्टर


जबलपुर के रामपुर छापर क्षेत्र में अपनी क्लिनिक चलाने वाले BAMS डॉक्टर राज कुमार राय की माने तो उनकी CMHO से बात हो गयी है। और खुद CMHO साहब ने उन्हें अनुमति दी है।
उनके हिसाब से तीन माह का एलोपैथी दवाएं लिखने का प्रशिक्षण जिला अस्पताल द्वारा दिया गया है।
लेकिन सवाल यह है की क्या महज 3 माह का प्रशिक्षण काफी है...???
और जिस प्रशिक्षण की बात डॉक्टर साहब कर रहे है वह खुद विवादों में है जिस के विषय मे विचार किया जा रहा है।
लेकिन बात बात पर डॉक्टर साहब पत्रकारों को अपने संगठन की धौस दिखाते हुए खुद के एलोपैथी दवाएं लिखने वाले कारनामे को जायज ठहरा रहे है।

आम जनता पिसती आयी है...

आम जनता की बात करें तो उसका क्या दोष...वो तो सोचती है कि जब मुहल्ले में धड़ल्ले से क्लिनिक चल रही है। तो सही ही होगी....उसे क्या पता कि नजराने के चक्कर मे कुछ भृष्ट अधिकारियों ने बंदरों के हाथ मे उस्तरा देकर जनता के बीच छोड़ दिया है...अब हजामत बनना तो लाजमी है। पर हजामत कैसी होगी...???
इससे उन्हें क्या..
आमजन तो उन्हें भगवान का दूसरा रूप जानकर उपचार कराने पहुंचता है। वह कोई डिग्री /डिप्लोमा तो देखता नहीं।
यह उसका काम भी नहीं है। यह काम है उन अधिकारियों का जो मोटी-मोटी पगार वाले जिम्मेदार पद पर बैठे है।


नोट-विकास की कलम अपने पाठकों से अनुरोध करती है कि आप अपने सुझाव हम तक जरूर भेजें..

ताकि आने वाले समय मे हम आपकी मदद से और भी बेहतर कार्य कर सकें। साथ ही यदि आपको लेख अच्छा लगे तो इसे ओरों तक भी पहुंचाए।

विकास की कलम
चीफ एडिटर
विकास सोनी
लेखक विचारक पत्रकार


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