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शनिवार, 20 जून 2020

घोटाले के अंदर घोटाला कोर्ट के आदेश दबाकर.. डकार रहे..प्रमोशन की पगार

घोटाले के अंदर घोटाला
कोर्ट के आदेश दबाकर..
डकार रहे..प्रमोशन की पगार

आज हम अपने पाठकों को स्वास्थ्य विभाग से जुड़े सबसे चर्चित  मामले  या यूं कहें सबसे चर्चित घोटाले के विषय में बताएंगे  जहां  घोटाले बाजों ने  हाईकोर्ट के आदेश को दबाकर  उसकी आड़ में  ना केवल प्रमोशन प्राप्त किया  बल्कि  लंबे समय से  फ्री की पगार भी  डकार रहे हैं ।

क्या है स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा चर्चित मामला -

 मप्र हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर की एकलपीठ के पूर्व आदेश को बड़ी चालाकी से दबाकर स्वास्थ्य विभाग में एक नया कारनामा अंजाम दिया गया। इसके जरिए अपने चहेते व्यक्ति- विशेष को डिमोशन से बचाने की कवायद की गई।

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समाज सेवी अरविंद मिश्रा ने किया खुलासा

सोशल एक्टिविस्ट अरविंद मिश्रा ने उक्त खुलासा करते हुए बताया कि मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय में कैम्प कोऑर्डिनेटर पद पर पदस्थ परितोष ठाकुर को उसके वर्तमान पद से डिमोशन से बचाने के लिए स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारी 3 माह में रिव्यू डीपीसी कराकर उसके आधार पर वरिष्ठता निर्धारण करने के हाईकोर्ट के पूर्व आदेश को ही दबा कर बैठ गए। 

हाईकोर्ट ने 26 फरवरी 2020 को परितोष ठाकुर को 41 वर्ष के स्थान पर 45 वर्ष की उम्र में पदोन्नत करने का आदेश दिया था। यदि इस आदेश का ईमानदारी से पालन किया जाता है तो परितोष ठाकुर वरीयता सूची में शामिल अन्य कर्मचारियों से 4 वर्ष पीछे हो जाएगा और अन्य उसके ऊपर आ जाएंगे। इस स्थिति में उसके लिए अपने वर्तमान कैम्प कोऑर्डिनेटर पद पर टिके रहना संभव ही नहीं हो पाएगा।

 यही वजह है कि मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ रत्नेश कुरारिया द्वारा इस संबंध में कोई प्रस्ताव क्षेत्रीय संचालक, स्वास्थ्य सेवाएं डॉ वाय. एस. ठाकुर को नहीं भेजा।

न योग्यता न ऐजबार..फिर भी प्रमोशन की पगार....???

दरअसल, परितोष ठाकुर ने न लेखा-प्रशिक्षण लिया, न 45 वर्ष की आयु पूरी की, फिर भी लेखापाल की कुर्सी पर जा बैठा। करीब 15 वर्ष तक यह अयोग्य व्यक्ति लेखापाल का वेतन लेते हुए कुर्सी पर जमे रहकर शासन को वित्तीय हानि पहुँचाता रहा। हाईकोर्ट ने 3 माह में इसकी रिव्यू डीपीसी का आदेश दिया लेकिन इसे डिमोशन से बचाने हेतु जिला चिकित्सालय के आला अधिकारियों ने उक्त आदेश को अमली जामा ही नहीं पहनाने दिया। सीएमएचओ कार्यालय में लिपिक परितोष ठाकुर का था ये कारनामा।

विक्टोरिया के लेखापाल ने नियम विरूद्ध तरीके से पायी थी पदोन्नति 

म.प्र. राजपत्र दिनांक 08.09.1989 में प्रकाशित लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण (संचालनालय स्वास्थ्य सेवाएं) तृतीय श्रेणी लिपिक वर्गीय सेवा भर्ती नियम 1989 की कापी दस्तावेज 2 के रूप में संलग्न है। इसकी अनुसूची 4 (ख) के बिन्दु क्र. 4 में लिखित है कि यदि कर्मचारी 45 वर्ष से कम उम्र का हो तो बिना लेखा प्रशिक्षण (एकांउट ट्रेनिंग) पास किए उसकी पदोन्नति लेखापाल पद में नहीं हो सकती लेकिन परितोष ठाकुर के मामले में इस कानूनी प्रावधान को छिपा लिया गया और तत्कालीन मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी द्वारा जारी पदोन्नति पत्र में एक नया प्रावधान यह जोड़ दिया गया कि वे लेखापाल पद पर पदोन्नति पहले ले लें और लेखा प्रशिक्षण बाद में पास कर लें। इस आदेश की कापी दस्तावेज 3 के रूप में संलग्न है। इस प्रकार वह 20 फरवरी 2004 के उक्त आदेश के द्वारा अवैध रूप से द्वितीय श्रेणी बाबू (असिस्टेंट ग्रेड-2) से लेखापाल (एकाउन्टेंट) के पद पर पदोन्नत किया गया। फिर कुछ दिनों बाद 29 मई 2004 को चुपचाप से उक्त कंडिका को विलोपित भी कर दिया गया। जो कि राजपत्र में प्रकाशित अनिवार्य प्रावधान के विपरीत था। 

45 की बजाए 41 साल में जल्दबाजी में पदोन्नति कर दी गई 

लेखापाल पद पर पदोन्नति के लिए 45 वर्ष की आयु पूर्ण होने की सीमा निर्धारित की गई है लेकिन 20 फरवरी 2004 को जब पदोन्नति आदेश जारी किए गए थे, तब उसकी आयु 41 वर्ष यानी पदोन्नति हेतु वांछित आयु से 4 वर्ष कम थी। ऐसी स्थिति में पदोन्नति हेतु आयु सीमा में छूट के लिए लेखा प्रशिक्षण लेना अनिवार्य था लेकिन परितोष ने लेखा-प्रशिक्षण प्राप्ति हेतु शासन को कभी आवेदन पत्र ही नहीं दिया। 

15 साल बाद खुला था राज 

यह राज तब खुला था, जब गढ़ा निवासी सामाजिक कार्यकर्ता अरविन्द मिश्रा द्वारा 19 नवंबर 2019 को फर्जीवाड़ा कर पदोन्नति पाने की शिकायत की। इस शिकायत में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी जबलपुर से इस बात की जांच की मांग की गई थी कि परितोष ठाकुर को सहायक ग्रेड-2 से लेखापाल पद पर पदोन्नति का लाभ गलत तरीके से और पात्र उम्मीदवारों को दरकिनार कर दिया गया था।

योग्य कर्मचारियों के हक पर डाला डांका

परितोष ठाकुर के नीचे के वरीयता क्रम में कई कर्मचारी थे, जो कि योग्य थे और जिन्हें नियमानुसार परितोष ठाकुर से पहले लेखापाल पद पर पदोन्नति मिलनी चाहिए थी, मगर लेखापाल पद पर अवैध रूप से परितोष ठाकुर की नियुक्ति होने से वे समय पर पदोन्नति से वंचित हो गए।

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शिकायत सही पायी गई तो डिमोशन कर रांझी अस्पताल भेजा 


जांच समिति को दिए लिखित बयान में परितोष ठाकुर ने भी स्वयं स्वीकार किया था कि उसने लेखा प्रशिक्षण प्राप्त नहीं किया है। लिहाजा, कमेटी ने उसे नियम विरूद्ध तरीके से पदोन्नति पाने का दोषी  पाया था। असलियत सामने आते ही तत्कालीन चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी जबलपुर द्वारा उसकी पदोन्नति को निरस्त करते हुए, उसे लेखापाल पद से डिमोशन करते हुए विक्टोरिया अस्पताल से हटाकर सिविल अस्पताल रांझी स्थानांतरित कर दिया गया था। 

कैसे वसूला जाएगा..वेतन का पैसा..??

इस सवाल पर स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी चुप्पी साधे बैठे हैं कि लिपिक को लेखापाल पद पर गलत पदोन्नति किए जाने में तथा हाईकोर्ट के आदेश की अवज्ञा करने में कौन दोषी है और 15 साल तक परितोष ठाकुर के द्वारा लिया गया लेखापाल पद का वेतन कैसे वसूल किया जाएगा?.

पदोन्नति 41 वें नहीं, 45 वें वर्ष में हो - हाईकोर्ट

अपने डिमोशन आदेश के विरूद्ध परितोष ठाकुर द्वारा हाईकोर्ट जबलपुर में रिट याचिका क्र. 2786/2020 दायर की, जिसमें 26 फरवरी 2020 को पारित अपने अंतिम आदेश में न्यायालय ने भी माना था कि पदोन्नति 41 वें नहीं, बल्कि 45 वें वर्ष में होनी थी। हाईकोर्ट द्वारा परितोष ठाकुर की वरीयता निर्धारण हेतु रिव्यू डीपीसी 3 माह की समय सीमा में करने का आदेश दिया था लेकिन तीन माह बीतने पर भी परितोष ठाकुर को पदानवति से बचाने के उद्देश्य से स्वास्थ्य विभाग द्वारा डीपीसी नहीं की जा रही है। 
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इस तरह बंद कर दी भ्रष्टाचार की जांच-  शिकायतकर्ता अरविन्द मिश्रा ने 15 नवम्बर 2019 को परितोष ठाकुर के खिलाफ दो शिकायतें  दर्ज कराईं। 

-पहली शिकायत फर्जी प्रमोशन की थी, जिसकी जांच 2 माह में पूर्ण हो करके परितोष ठाकुर के डिमोशन की कार्यवाही भी पूरी कर ली गई थी। 
-दूसरी शिकायत विगत 10 वर्षों में विभिन्न प्रभारों जैसे वाहन शाखा, दवा खरीदी व अन्य खरीदी में लगभग 3 करोड़ रुपए से अधिक की शासकीय खरीद बिना किसी क्रय नियम का पालन किए फर्जी बिल लगाकर करने से संबंधित थी। इसमें क्रय नियमों के विपरीत कोटेशन एक ही व्यापारी से लिए और खरीद के पश्चात केवल बिल का भुगतान कर बंदरबांट की गई थी लेकिन अधिकांश खरीदी सामग्री विभाग को प्राप्त नहीं हुई थी। अतः स्टोर स्टॉक रजिस्टरों में उक्त क्रय सामग्री की प्राप्ति और वितरण के अभिलेखों और विकासखण्ड के स्टॉक रजिस्टरों में क्रास वेरिफिकेशन कर जाँच की जानी थी। 
दिलचस्प बात यह है कि 2 दिसम्बर 2019 को साक्ष्य हेतु शिकायतकर्ता अरविन्द मिश्रा ने जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित होकर अपना बयान दर्ज कराया था। आश्चर्य है कि तब से 6 माह से अधिक समय हो गया है लेकिन परितोष ठाकुर के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई बल्कि जांच को ही बंद कर दिया गया है। 

इन अनियमितताओं से स्वास्थ्य विभाग की हो रही धूमिल छवि और हाथ से ठीक से लेखन कार्य (हस्त लेखन) में असमर्थता के चलते परितोष ठाकुर को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दिया जाना शासन के हित में था। ऐसा न कर पिछले 10 माह से उन्हें बिना काम के वेतन दिया जाना बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है।

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विकास की कलम
चीफ एडिटर
विकास सोनी
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