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रविवार, 28 जून 2020

काली धान की समस्या से छुटकारा मेडागास्कर विधि से करे रोपाई जानिए क्या है..मेडागास्कर विधि

काली धान की समस्या से छुटकारा
मेडागास्कर विधि से करे रोपाई
जानिए क्या है..मेडागास्कर विधि

मेडागास्कर विधि धान उत्पादन कि एक उन्नत तकनीक है, इस तकनीकी से धान की खेती में उत्पादन 300 प्रतिशत तक ज्यादा मिलता है, बीज विधि से रोपाई करने पर काली धान (जंगली धान) की समस्या भी बहुत कम होती है। तथा भूमि, श्रम, पूंजी और पानी बहुत कम लगता है। इस पद्धति को श्री पद्धति के नाम से भी जाना जाता है। पारस्परिक तकनीक में धान पौधों को पानी से लबालब भरे खेतों में उगाया जाता है, वहीं मेडागास्कर तकनीक में पौधों की जड़ों में नमी बरकरार रखना ही पर्याप्त होता है लेकिन सिंचाई के पुख्ता इंतजाम जरूरी है ताकि जरूरत पड़ने पर फसल की सिचांई की जा सकें।

      उप-संचालक किसान कल्याण तथा कृषि विकास श्री शर्मा ने बताया है इस विधि में 8-12 दिन की पौध को रोपा जाता है पौधों की रोपाई 25×25 सें.मी पर की जाती है खेत में धान में बाली आने तक बारी-बारी से नम एवं सूखा रखा जाता है एवं पानी से नहीं भरा जाता है। पौधों की कटाई करने में 25 दिन पहले खेत से पानी निकाल दिया जाता है। जैविक खाद जितना हो सके, उतना प्रयोग किया जाता है। धान की रोपाई के 10 दिन बाद मशीन से निराई (खरपतवार निकालना) शुरू करनी चाहिए कम से कम दो बार निदाई आवश्यक है ज्यादा हो सके तो बेहतर है। माना जाता है कि यह जड़ वाले हिस्से में बेहतर बढ़ोत्तरी की परिस्थिति प्रदान करता है, लागत में कमी करता है, मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार लाता है एवं पानी के उपयोग को बेहतर बनाता है।

      सहायक संचालक जे.एल. प्रजापति ने बताया इस विधि को अपनाकर बिहार के नालंदा जिले के दरवेशपुरा गांव में किसान सुमंत कुमार ने एक हे. में 224 क्विंटल धान पैदा कर विश्व रिकार्ड बनाया। इस विधि में 2 कि.ग्रा. प्रति एकड़ बीज की आवश्यकता होती है, श्री पद्धति में पानी सामान्य विधि की तुलना में आधा पानी ही लगता है, कम खर्च की आवश्यकता होती है, और उपज भी अच्छी होती है। श्री पद्धति में कम उर्वरक और पौध सुरक्षा रसायनों की कम जरूरत होती है।

नर्सरी प्रबंधन की जानकारी

      धान की श्री पद्धति से रोपाई हेतु 0.1 एकड़ क्षेत्र में एक मीटर चैड़ी नर्सरी स्वस्थ बीजों का चयन कर तथा बीज को अंकुरित कर केंचुआ खाद या गोबर की खाद में बोया जाता है। एक एकड़ हेतु 2 कि.ग्रा. बीज की आवश्यकता होती है। नर्सरी में बीज बोने के बाद धान के पुआल आदि से ढक दिया जाता है। 8 से 12 दिन में नर्सरी रोपाई हेतु तैयार हो जाती है।

रोपाई से जुड़ी विशेष बात

उन्होंने बताया 8-12 दिन वाले पौधों की रोपाई की जाती है,पौधों को मिट्टी सहित बिना किसी नुकसान के उखाड़ा जाता है, पौधों को कम गहराई पर लगाया जाता है, इससे वह जल्दी जड़ पकड़ लेता है। एक पौधे को बीज व मिट्टी सहित अंगूठे व कनिष्का अंगुली की सहायता से रोपाई की जाती है। रोपाई 25×25 सें.मी. की दूरी पर की जाती है। एस.आर.आई. मार्कर की सहायता से 25×25 सें.मी की लाइन बनाये और दोनों लाइनों के जोड़ पर पौधा लगाएं यदि एस.आर.आई.  मार्कर उपलब्ध न हो तो एक रस्सी में 25 सें.मी फ्लेग लगाकर रोपाई करें।

उन्नतशील किस्मों की जानकारी

                  US-382, JRH-4, JRH-5 पूसा सुगंधा-1,2, MTU-1010, IR-64 शीघ्र पकने वाली किस्में - JRH-5,8, PS-6129 दंतेश्वरी सहभागी मध्यम समय में पकने वाली 353 WGL-32100, JR- 353, पूसा सुगंधा 3, पूसा सुगंधा - 5, MTU-1010, JR- 353, बासमती किस्में, पूसा बासमती - 1121, पूसा बासमती - 1589, पूसा बासमती -1460

यहां करें संपर्क

कृषक बंधु तकनीकी सलाह हेतु अपने क्षेत्र के ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी एवं संबंधित विकासखण्ड के वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी या कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिक, डा राजेश द्विवेदी के मोबाईल नंबर 9993532337 पर संपर्क कर तकनीकी सलाह प्राप्त कर सकते है।

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विकास की कलम
चीफ एडिटर
विकास सोनी
लेखक विचारक पत्रकार


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