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ये कैसा सरकारी फरमान.. कलम की जगह गेंती-फावड़ा अतिथि विद्वान बना मनरेगा का मजदूर

ये कैसा सरकारी फरमान..
कलम की जगह.. गेंती-फावड़ा
अतिथि विद्वान बना-मनरेगा का मजदूर

(अमित श्रीवास्तव-सिवनी)
कोरोना संक्रमण के चलते लगाए गए  लॉक डाउन ने सभी की जिंदगी को बदल के रख दिया है। जहाँ लोगो की दिनचर्या में फर्क पड़ा है वही दूसरी ओर एक बड़ी तस्वीरे बेरोजगारी की  भी उभर कर सामने आ रही है। बेरोजगारी से उबरने के लिए सरकार ने मनरेगा के अंर्तगत विभिन्न कार्यो को चालू किया है। पर इन मनरेगा के कार्यो में लगे हमारे देश के पढ़े लिखे लोग भी अपना जीवन यापन करने के हाथों में गेंती फावड़ा लिए नज़र आ रहे हैं।एक ओर ये युवा अपने गाँव से बाहर रहकर बड़े बड़े कार्यो को कर थे कुछ कंपनियों में सुवाईजर तो कुछ कम्प्यूटर आपरेटर तो कुछ युवा अतिथि शिक्षकों के  हमारे देश का भविष्य संवारने में लगे हुए थे। लेकिन आज वे भी बेरोजगारी के चलते मनरेगा के कामो को करते देखे जा रहे हैं। हम बात कर रहे ऐसे ही युवा अतिथि शिक्षक की जो लॉक डाउन के चलते अब बेरोजगार हो गया है। 

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बैगापिपरिया संकुल के एक  प्राइमरी स्कूल का अतिथि शिक्षक लॉक डाउन के चलते कर रहा मजदूरी

इतनी पढ़ाई के बाद लाॅकडाउन में जब काेई राेजगार नहीं मिला ताे अपना और परिवार का पेट पालने के लिए बी. ए पास  अतिथि शिक्षक मजदूर बन गया। जिन हाथाें में एक महीने पहले तक कलम हुआ करती थी। आज वहीं हाथ मिट्टी ढाे रहे हैं। मजदूर बन वह नदी नाले में खंतियां खाेदकर मिली मजदूरी से अपना व परिवार का पेट पाल रहा है।

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कौन है ? ये अतिथि शिक्षक..क्यो कर रहा मजदूरी..?

काेराेना वायरस के संक्रमण और लाॅकडाउन के चलते जहां जीवन थम सा गया है, वहीं कई लोगों के जीवन पर इसका विपरीत प्रभाव भी पड़ा है। राेजगार नहीं मिलने से कई लाेगाें काे मजबूरी में अपना पेशा तक बदलना पड़ा। 
26 साल का सरमन उर्फ रामा पिता लक्ष्मण इनवाती निवासी बरवटी बैगा पिपरिया के एक प्राथमिक शाला  में अतिथि शिक्षक था। बी ए पास करने के बाद  उसने काफी मेहनत कर डी एल एड की परीक्षा उतीर्ण की। उसका सपना था कि वह एक अच्छा शिक्षक बने। कुछ हद तक उसका सपना पूरा भी हुआ और पास के गांव में अतिथि शिक्षक की नाैकरी मिल गई। पर उसे क्या पता था कि ...आने वाले समय मे उसकी सारी पढ़ाई..धरी की धरी रह जायेगी....

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प्रदेश सरकार के फरमान ने दी नरक की जिंदगी...

प्रदेश शासन ने 30 अप्रैल काे सभी अतिथि शिक्षकाें काे कार्यमुक्त कर दिया, जिससे सरमन की नाैकरी भी चली गई। वह बेराेजगार हाे गया। लाॅकडाउन में उसे कहीं नाैकरी भी नहीं मिली। माता-पिता, भैया भाभी व अपने गुजारे के लिए उसने गांव में ही मनरेगा में मजदूरी शुरू कर दी। सरमन ने बताया, शिक्षक था ताे उसे 5 हजार रुपए महीना वेतन मिलता था, यहां 180 रू. दिन की मजदूरी मिल रही है। परिवार का पेट पालना था ताे कलम छाेड़कर मजदूरी के लिए तगारी और फावड़ा उठा लिया। वही जिम्मेदार कैमरे में कुछ भी कहने से बच रहे है। 

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विकास की कलम
चीफ एडिटर
विकास सोनी
लेखक विचारक पत्रकार