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सोमवार, 20 अप्रैल 2020

अभी न जाओ छोड़ के..... कोरोना की कराह के बीच..रो दिया जबलपुर...

अभी न जाओ छोड़ के.....
कोरोना की कराह के बीच..रो दिया जबलपुर...



पुलिस का नाम सुनते ही जहन में एक अजीब सी टीस उठती है...कभी अपनी बर्बरता तो कभी अपनी ज्यातती को लेकर पुलिस के प्रति नागरिकों की एक अलग ही राय होती है। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसा अधिकारी आता है।
 जो कि लोगों के नजरिये को ही बदल के रख देता है।ये संस्कारधानी का सौभाग्य ही था कि शहर को अमित सिंह जैसा पुलिस कप्तान मिला।जिसने दबंगों के दिल मे दहशत और आमजन के दिल मे दोस्त बनकर राज किया।

एसपी अमित सिंह का हुआ तबादला


एक ओर जबलपुर शहर अमित सिंह की अगुवाई में  कोरोना से जंग लड़ रहा था। वहीं इन सबके बीच सोमवार की शाम को आये सरकारी फरमान ने सभी को हिला के रख दिया।

अभी अभी तो शहर लड़खड़ाते हुए संभला था और तभी ऐसा फरमान आना।यह बात हजम होना तो दूर,जानकारों की भी समझ के परे है।
कई जानकार इसे अलग अलग पहलुओं से जोड़कर देख रहे है।कोई इस बात को राजनीति से जोड़ रहा है.. तो कोई षड्यंत्र से ...लेकिन इन सबके बीच अभी भी जनता दबी जुबान से ये पूछ रही है..क्या वाकई अभी इस फरमान की जरूरत थी..


बस आंसू निकलना बाकी है.... साहब



एसपी अमित सिंह की पहचान उनके पद से नही बल्कि उनके व्यवहार से है। वैसे तो शहर में कई एसपी आये और चले गए। जनता को क्या....
लेकिन उसे वो सख्श हमेशा याद रहेगा जो अपना कामकाज छोड़ के एक बूढ़ी अम्मा के साथ एसपी ऑफिस की सीढ़ियों में बैठकर दर्द बंटता था।


जनता ये भी नही भूली की कैसे अमित सिंह बुजुर्ग दंपति की एक पुकार पे उसे उसका हक दिलाने अनायास ही निकल पड़ते थे।
वो ये कैसे भूल जाये जहां सुनवाई करवाने में चप्पल घिस जाया करती थी।वहां जनता दरबार लगने लगा।



फिर चाहे कप्तान की कुर्सी पर बैठा बच्चा हो या सड़क किनारे चाय का ठेला लगाने वाला... किस्से इतने है कि गिनाना मुश्किल है।
शहर की जनता अमित सिंह को एसपी नही परिवार का मुखिया मानती है और इस मुखिया के साथ वो अपने हर अच्छे बुरे पल को साझा करती है। ऐसे में अमित सिंह की बिदाई की बात सोचने मात्र से उसके आंसू उभर आते है।

अमित सिंह के साथ मेरा व्यक्तिगत अनुभव

बात बिते साल 10 नवंबर की है जब
इस पार ग्यारस तो उस पार मिलादुन्नबी....
और बीच मे राम मंदिर फैसला..
उस पर शहर की अवाम का जोश...पलक की एक झपकी भी बड़ा नुकसान कर सकती थी...लेकिन जबलपुर उन दिनों  मजबूत कंधो पर था। मैंने महसूस किया कि  मुखिया कितने तनाव में था। जब लोग अपने अपने घरों में रोटी खाकर सोने की तैयारियों में मशहुल थे तब जिम्मेदार रणनीति बनाने में व्यस्त थे। आंखे बता रही थी कि शायद कुछ दिनों से उन्हें नींद भी नसीब नही हुई है। लेकिन परिवार(शहर) की जिम्मेदारी शायद उस नींद पर भी भारी पड़ गयी। लोगो की जब नींद खुली तो उन्होंने पाया कि पूरे शहर में चाकचौबंद चौकसी लगी हुई थी। और हर एक सड़क पर मुखिया खुद कमान संभाले दिख रहे थे।सब के नाश्ते खाने का प्रबंध था पर शायद मुखिया ने कुछ खाया की नही यह पूछने का न तो सही समय था न माहौल।
दिन ढल गया रात होने को आई...चौकसी इतनी तेज की परिंदा भी पर न फड़फड़ा सका।
हम सो पा रहे है क्योंकि कमान आपके हाँथों में है...
अब हर जुबान पर बस एक ही बात बुदबुदा रही है

*जबलपुर की जिम्मेदारी-जिम्मेदार कंधो पर है*

विकास की कलम का एसपी अमित सिंह को सेल्यूट...

पत्रकारिता के दौरान हम कई अधिकारियों से मिलते है...कइयों के साथ हमारी विचारधारा मेल खाती है..तो कई बार बहस हो जाना भी लाजमी है। लेकिन इन सबके बीच कभी कभार एक ऐसा अधिकारी मिलता है। जिसे सेल्यूट करने का दिल करता है। और वाकई अमित सिंह उन नायाब अधिकारियों में एक है। जिन्होंने न केवल जबलपुर बल्कि  आम जनता के दिलों में राज किया है। आप जबलपुर से स्थानांतरित हो सकते है मगर हमारे दिल से नहीं।आपने हमेशा एक बड़ा भाई बनकर हमारा मार्गदर्शन किया है। 

विकास की कलम
चीफ एडिटर
विकास सोनी
(लेखक विचारक पत्रकार)





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