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रविवार, 19 जनवरी 2020

कीड़ा नोई जीरा आए... खा-लो चुप्पई चाप..मध्यान भोजन में ये कैसा पोषक आहार ..??

कीड़ा नोई जीरा आए... खा-लो चुप्पई चाप..मध्यान भोजन में ये कैसा पोषक आहार ..??

कीड़ा नही जीरा है..खा लो चुपचाप..और सुनो किसी से कुछ कहना मत......
बच्चे की शिकायत पर मध्यान्ह भोजन परोस रही स्वसहायता समूह की महिला का यह जबाब सुनकर बच्चों के रोंगटे खड़े हो गए...

आप ये घटना पढ़े इससे पहले हम अपने पाठकों को यह बताना चाहते है कि यह योजना क्या है ताकि आप समझ सकें कि सरकार तो समय समय मे जनता के लिए हमेशा कल्याणकारी /जनहितकारी योजनाएं लाती है पर कुछ मौका परस्त और गैर जिम्मेदार लोगों के चलते पूरा सिस्टम बदनाम हो जाता है।

क्या है.. ? मध्यान्ह भोजन योजना..

मध्यान्ह भोजन योजना 15 अगस्त 1995 में भारत सरकार द्वारा शुरू की गई थी. इस योजना का मुख्य उद्देश्य पूरे देश के प्राथमिक और लघु माध्यमिक विद्यालयों के छात्रों को दोपहर का भोजन निःशुल्क प्रदान करना है। नामांकन बढ़ाने, प्रतिधारण  और उपस्थिति तथा इसके साथ- साथ बच्चों में पौषणिक स्तर में सुधार करने के उद्देश्य इस योजना की शुरुआत की गई।
मौजूदा मानदंडों के अनुसार, प्राथमिक बच्चों को 30 ग्राम दालों, 75 ग्राम सब्जी और 7.5 ग्राम सब्जियां प्रदान की जाती हैं
नए 2015 मधुमेह योजना के नियमों के अनुसार, विशिष्ट कारणों से भोजन की आपूर्ति न होने के मामले में, खाद्य सुरक्षा भत्ता का भुगतान करना होगा और यदि स्कूल के तहत आबंटित धनराशि मिलती है तो विद्यालय अन्य धन का उपयोग कर सकता हैं
अधिकतर बच्चे खाली पेट स्कुल पहुँचते हैं, जो बच्चे स्कूल आने से पहले भोजन करते हैं, उन्हें भी दोपहर तक भूख लग जाती है और वे अपना ध्यान पढाई पर केंद्रित नहीं कर पाते हैं। मध्याह्न भोजन बच्चों के लिए " पूरक पोषण " के स्रोत और उनके स्वस्थ विकास के रूप में भी कार्य कर सकता है। यह समतावादी मूल्यों के प्रसार में भी सहायता कर सकता है ,क्योकि कक्षा में विभिन्न सामाजिक पृष्ठ्भूमि वाले बच्चे साथ में बैठते हैं और साथ - साथ खाना खाते हैं। विशेष रूप से मध्याह्न भोजन स्कूल में बच्चों के मध्य जाति व् वर्ग के अवरोध को मिटाने में सहायक हो सकता हैं। स्कूल की भागीदारी में लैंगिक अंतराल को भी यह कार्यक्रम कम कर सकता हैं, क्योकि यह बालिकाओं को स्कूल जाने से रोकने वाले अवरोधो को समाप्त करने में भी सहायता करता हैं। मध्याह्न भोजन स्किम छात्रों के ज्ञानात्मक, भावात्मक और सामाजिक विकास में सहायता करता हैं। सुनियोजित मध्याह्न भोजन को बच्चों में विभिन्न अच्छी आदतें डालने के अवसर के रूप में उपयोग में लाया जा सकता हैं। यह स्किम महिलाओं को रोजगार के उपयोगी स्त्रोत भी प्रदान करता हैं।



अब जानिए मुख्य घटना के विषय में....

शहपुरा जनपद के नवीन शासकीय स्कूल का मामला..

मैडम मैडम सब्जी में कीड़ा है एक छात्र की यह शिकायत सुनते ही स्कूल के बाकी बच्चों ने मध्यान भोजन की थाली पटक दी... मामला जबलपुर की बरगी विधानसभा के शाहपुरा जनपद में आने वाले नया नगर का है जहां नवीन माध्यमिक विद्यालय में बच्चों को मध्यान भोजन परोसा गया था। लेकिन जब बच्चों ने थाली में देखा तो सब्जी में कीड़े और मक्खियां पाई गयी।
हद तो तब हो गई  जब भोजन परोसने वाली जागृति स्व सहायता समूह की महिलाओं ने स्कूली बच्चों से यह कह दिया कि.... चुपचाप खा लो यह कीड़ा नहीं जीरा है और सुनो किसी से कुछ कहना मत।
इस पूरे प्रकरण की जानकारी जैसे ही शिक्षकों तक पहुंची आनन-फानन में समूह की महिलाओं द्वारा बच्चों के पास से मध्यान भोजन हटा लिया गया।
  हालांकि इस बात की जानकारी जब  शिक्षको तक पहंुची  तो उसके बाद समूह के द्वारा बच्चों को मध्यान्ह भोजन नहीं परोसा गया।

मध्यान भोजन पकाने वालों ने दी सफाई..

मामले को तूल पकड़ता देख स्कूल प्रबंधन ने मध्यान भोजन का निर्माण बंद करवा दिया लेकिन बात अब जंगल में आग की तरह फैल चुकी थी लिहाजा सफाई देना भी जरूरी था पत्रकारों से बात करते हुए जागृति स्व सहायता समूह की रसोईया उमा बाई ने यह बात कबूल तो की.... की सब्जी में मक्खियां और कीड़े हैं.. लेकिन बार-बार वह अपने भोजन की गुणवत्ता की बात भी दोहराती रही..
उसका कहना था कि भोजन तो ठीक बना था लेकिन स्कूल आते वक्त हो सकता है उसमें मक्खियां गिर गई हो और मक्खियां हटाकर भोजन करने में कोई मलाल नहीं है ऐसी बात भी उमाबाई बार-बार दोहराती रही।

स्कूल प्रबंधन ने लगाई स्व सहायता समूह को फटकार..

मध्यान भोजन की गुणवत्ता को लेकर इतनी बड़ी लापरवाही के चलते स्कूल प्रबंधन द्वारा मध्यान भोजन बनाने वाली जागृति स्व सहायता समूह के सदस्यों को जमकर फटकार लगाई है प्रबंधन का साफ कहना था की यदि इस तरह गलतियां दोबारा हुई तो वे उच्च स्तर पर इसकी शिकायत करेंगे इस दौरान स्कूल प्रबंधन ने भोजन बनाने वाली महिलाओं को गुणवत्ता युक्त एवं स्वच्छता का ध्यान रखते हुए मध्यान भोजन बनाने एवं परोसने की हिदायत दी है।

स्कूल प्रबंधन पर भी घूम रही शक की सुई...


नियमों की माने तो मध्यान भोजन को परोसने से पहले स्कूल प्रबंधन द्वारा उपरोक्त भोजन की और उसके गुणवत्ता की जांच स्वयं चखकर की जाती है । लेकिन घटना पर नजर डाली जाए तो बच्चे की थाली में पहुंची सब्जी मक्खी और कीड़ों से लबरेज थी। इस घटना से एक बात तो साफ हो जाती है कि या तो स्कूल प्रबंधन द्वारा भोजन को चेक ही नहीं किया जाता या फिर स्कूल प्रबंधन के लिए अलग से कोई खास भोजन बनाया जाता है। क्योंकि यदि उस दिन स्कूल प्रबंधन को बच्चों वाला भोजन परोसा जाता तो, कीड़ों से भरी सब्जी बच्चों तक पहुंच ही नहीं पाती। इन सारी बातों से एक बात तो साफ है कि कहीं ना कहीं दाल में कुछ काला जरूर है या यूं कहें की आपसी मेलजोल के चलते पूरी दाल ही काली हो चुकी है।

पूरे जिले में हो गया हल्ला और जनपद के अधिकारी बने रहे अनजान..

यह कोई नया मामला नहीं है इससे पहले भी ऐसी कई घटनाएं अलग-अलग जगहों से आती रही हैं लेकिन अधिकारियों के सुस्त रवैया के चलते कार्यवाही या नहीं होती और लापरवाही करने वालों को शह मिलती जाती है। शहपुरा विकासखंड के स्कूलों में आ रही मध्यान भोजन की गड़बड़ियों को लेकर जिम्मेदार अधिकारी कान में रुई डाल कर बैठे हुए हैं वही जनपद पंचायत कार्यालय के अधिकारियों ने घटना के संबंध में कोई जानकारी ना होने की बात कही है।

कलेक्टर के दरबार तक पहुंचा मामला..

घटना की जानकारी जैसे ही कलेक्टर भरत यादव को लगी उन्होंने पूरे मामले की विस्तृत जांच के आदेश दे दिए हैं कलेक्टर श्री भरत यादव ने कहा कि एक विशेष दल इस पूरे प्रकरण की जांच करेगा इसमें जो भी व्यक्ति दोषी पाया जाएगा उसके ऊपर सख्त कार्यवाही की जाएगी साथ ही इस पूरे मामले को लेकर संबंधित अधिकारी जागृति स्व सहायता समूह और स्कूल प्रबंधन से भी जवाब तलब किया गया है।

विकास की कलम

चीफ एडिटर
विकास सोनी
(लेखक, विचारक, पत्रकार)

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चीफ एडिटर
विकास सोनी
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