काय बड्डे.... चालान की चिंता है..जान कि नई..?? (अगर वाकई चिंता होती तो सुधर जातो जबलपुर) - VIKAS KI KALAM,Breaking news jabalpur,news updates,hindi news,daily news,विकास,कलम,ख़बर,समाचार,blog

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काय बड्डे.... चालान की चिंता है..जान कि नई..?? (अगर वाकई चिंता होती तो सुधर जातो जबलपुर)

 काय बड्डे.... चालान की चिंता है..जान कि नई..?? (अगर वाकई चिंता होती तो सुधर जातो जबलपुर)



नियम और कानून जनता की भलाई के लिए बनाए गए हैं और भारत के प्रत्येक नागरिक को चाहिए कि वह  इन नियम कानूनों का पालन कर सहयोग भी प्रदान करें। लेकिन विषम परिस्थितियों में मानवीय संवेदना के चलते इन नियमों का उल्लंघन भी किया जा सकता है और बदलाव भी....।
 जी हां हम बात कर रहे हैं उस मानसिक मनोदशा की, जहां पर मानवीय संवेदना  के सामने सारे नियम और कानून कोई अहमियत नहीं रखते। लेकिन सड़कों के किनारे खड़े ट्रैफिक पुलिस के नुमाइंदों के सामने यह सारी मानवीय संवेदना शून्य हो जाती हैं, और फिर कुछ ऐसा हो जाता है जोकि पूरे सिस्टम को शर्मसार कर जाता है।

चालान के चक्कर में गई युवक की जान..

जबलपुर शहर के ग्वारीघाट क्षेत्र में बिग बाजार के पास रहने वाले सचिन विश्वकर्मा की ऑटो में अस्पताल जाने के दौरान मौत हो जाने के मामले में अब बवाल मच चुका है। युवक की मौत को लेकर परिजनों ने आरोप लगाया है कि ट्रैफिक पुलिस की चालानी कार्यवाही को लेकर इलाज में देरी हुई जिस कारण सचिन की मौत हुई है। 



अब सवाल यह पैदा होता है कि सचिन की मौत का जिम्मेदार कौन है??
 21 साल के सचिन की लाश को उसके घर के सामने ही रखकर क्षेत्रीय जनता अब जिम्मेदारों से जवाब मांग रही है , कि क्या चालानी कार्यवाही करना इतना जरूरी था की मरीज को अस्पताल जाने से ही रोक दिया। बहरहाल जिम्मेदार अब उपरोक्त ट्रैफिक सिपाही(कर्मी) पर कार्यवाही करने की बात कर रहे हैं।

क्या है पूरा मामला.. कैसे हुई घटना..?

इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए विकास की कलम ने मृतक के परिजनों से मुलाकात की।
 मृतक के परिजनों ने हमें बताया कि सचिन को गुरुवार के दिन करीब 1:00 बजे सीने में बहुत तेज दर्द उठा था। वह ऑटो से मेडिकल जा रहा था उसी समय बादशाह हलवाई मंदिर के पास लगी  ट्रैफिक चेकिंग के  ट्रैफिक कर्मियों ने ऑटो रोककर उसमें पटिया लगा होने की बात पर ₹500 का चालान किया । ऑटो चालक आशीष ने संबंधित ट्रैफिक कर्मी से प्रार्थना की कि उसके पास पैसे नहीं है आप ई- चालान कर दें। खुद सचिन ने भी यह कहा था कि उसके सीने में बहुत तेज दर्द है। वह इलाज के लिए अस्पताल जा रहा है । लेकिन इसके बाद भी  ट्रैफिक कर्मियों ने  इनकी एक ना सुनी और दो टूक लफ्जों में चालान के पैसों का इंतजाम करने की बात कह डाली।
 चालान के पैसों की व्यवस्था करने ऑटो चालक आशीष यहां वहां हाथ मारने लगा पैसों की व्यवस्था करने में उसे देर हो गई वह 1 घंटे के अंदर पैसे लेकर लौटा और फिर उसके बाद ही ऑटो चालक को वहां से जाने दिया गया। पीड़ित सचिन विश्वकर्मा को मेडिकल अस्पताल पहुंचते पहुंचते काफी देर हो चुकी थी। मेडिकल अस्पताल के अंदर कैजुअल्टी में जैसे ही पीड़ित सचिन को ले जाया गया उसकी मौत हो गई। इस दौरान डॉक्टरों ने ऑटो चालक से कहा की यदि आप इसे कुछ देर पहले ले आते, तो शायद इसकी जान बचाई जा सकती थी।

दुखद घटना से क्षेत्रीय जनों में आक्रोश..


इस पूरी घटना को लेकर क्षेत्रीय जनों में पुलिसिया रवैया के चलते काफी आक्रोश व्याप्त है। लोगों ने आरोप लगाया है कि चालानी कार्यवाही महज अपनी जेब भरने के लिए की जा रही है और जब ऑटो चालक ने उसे पैसे नहीं दिए और e-challan के लिए बोला तो पुलिसकर्मियों ने जबरन उसे पैसे की व्यवस्था करने के लिए बाध्य किया।जिसके कारण देरी हुई और युवक की हार्टअटैक के कारण मौत हुई। क्षेत्रीयजनों ने युवक के शव को सड़क पर ही रख कर चक्का जाम किया। घंटों चले सड़क जाम के बाद एडिशनल एसपी अमृत मीणा मौके पर पहुंचे और क्षेत्रीय जनों को आश्वासन दिया कि जिस ट्रैफिक कर्मी द्वारा  ऑटो चालक को चालान के लिए परेशान किया गया था । उसकी जांच कर  दोषी ट्रैफिक कर्मी पर जल्द से जल्द कार्यवाही की जाएगी।

दोषी पर कार्यवाही और बीस हजार रुपये देने का दिया आश्वासन..

आपको बता दें कि चक्काजाम के दौरान जनता इतनी आक्रोशित थी कि वह एक के बाद एक ट्रैफिक पुलिस के ऊपर आरोप लगाते जा रही थी। 


इस दौरान ट्रैफिक पुलिस के खिलाफ बढ़ते आक्रोश को देखते हुए जिम्मेदारों ने यह आश्वासन दिलाया है  की इस पूरे मामले की ना केवल जांच कराई जाएगी बल्कि मृतक के परिजन को ₹20000 की सहायता भी दी जाएगी। गौरतलब है कि सचिन के पिता की मौत हो चुकी है, और वह अपने जीजा के पास रहकर ही वाहन चलाया करता था।

जनता ने लगाए संगीन आरोप-शाम होते ही शुरू कर देते है लूट खसोट..

चक्काजाम के दौरान ट्रैफिक पुलिस की करवाई को लेकर आमजनों का गुस्सा फूट पड़ा। इस दौरान लोगों ने ट्रैफिक पुलिस की जबरिया कार्यवाही पर कई सवालिया निशान खड़े कर दिए।
लोगो का कहना था कि शाम ढलते ही ट्राफिक पुलिस झुंड बनाकर आमजनता का शिकार करने लगती है।पूरे कागजात होने के वाबजूत लोगों को घंटो खड़ा रखा जाता है। 100-200 के चक्कर मे सड़क के किनारे मजमा सा लगा रहता है।नियम कानून का भय दिखाकर।चालान कम और अपनी जेब ज्यादा गरम की जाती है।

ई-चालान क्यो नही स्वीकार किया जाता।

चलानी कारवाही के दौरान यदि वाहन चालक के पास चालान भरने की रकम न हो तो उसके लिए ई-चालान की भी व्यवस्था की गई है। जिसे वह संबंधित कार्यालय में जमा कर चालान कटवा सकता है। लेकिन जनता ने आरोप लगाया है कि ट्रेफिक पुलिस अक्सर ई-चालान करने से कतराती है। ज्यादा बहस करने पर भारी भरकम चालान किये जाने की बात तक कह दी जाती है ,बाद में कुछ मामूली सी रकम लेकर..और समझाइश देकर वाहन चालक को छोड़ दिया जाता है।इस पूरे मेलोड्रामा के दौरान वाहन चालक को साफ कह दिया जाता है कि अगर रसीद कटवाओगे तो 1000 -500 लगेंगे या फिर .....................दे दो और चलते बनो।

पूरे मामले में कौन है दोषी.. ऑटो चालक या ट्रैफिक पुलिस..??

ट्रैफिक नियमों की यदि बात करें तो सचिन विश्वकर्मा के मामले में पुलिस चाहती तो उपरोक्त ऑटो चालक की दस्तावेजों को अपने पास संभाल कर रख लेती और दूसरे दिन ऑटो चालक संबंधित ट्रैफिक थाने में पहुंचकर चालन अदा कर अपने दस्तावेज प्राप्त कर लेता। दूसरी ओर ट्रैफिक पुलिस चाहती तो तत्काल ऑटो का नंबर मोबाइल में रिकॉर्ड कर सिटीजन कॉप ऐप के जरिए उसका ई चालान भी काट सकती थी लेकिन पूरे मामले में पुलिस ने ₹500 का चालन तत्काल कटवाने और पैसों की व्यवस्था करने का दबाव बनाया जिसके चलते ऑटो चालक को पैसे की व्यवस्था करने में समय लगा और वह पीड़ित को अस्पताल ले जाने में लेट हो गया। जिसके चलते ही पीड़ित सचिन विश्वकर्मा की मौत हुई है। अब सवाल यह है की आखिर सचिन विश्वकर्मा की मौत की जिम्मेदारी कौन लेगा।

विकास की कलम का जिम्मेदारों से सवाल?

घटना के बाद से ही कई सवाल खड़े हो गए हैं। लेकिन ना तो यह घटना पहली है और ना ही आरोप...अब सवाल यह पैदा होता है की जिम्मेदार आखिर घटना होने के बाद ही क्यों जागते है।
 जिम्मेदारों और जबलपुर की जनता को याद ही होगा कि कुछ वर्ष पूर्व रानीताल के व्यस्ततम चौराहे पर ऐसी ही चेकिंग के दौरान एक व्यक्ति की मौत हो गई थी और यदि आंकड़े उठाकर देखा जाए तो ऐसे 1-2 नहीं बल्कि कई मामले हैं जोकि जिम्मेदारों की कार्यवाही पर सवालिया निशान खड़े करते हैं।

सवाल यह है कि वाकई में यदि ट्रैफिक पुलिस नियम कानून को लेकर इतनी सख्त है तो फिर....

 1.ऑटो चालक बेखौफ होकर ओवरलोडिंग कैसे कर पा रहे हैं

2. नो एंट्री में भारी वाहन शहर के अंदर कैसे घुस रहे हैं

3. ट्रैफिक पुलिस कि मानवता बड़े अधिकारियों और रसूखदारो के लिए ही क्यों.. आम जनता के लिए क्यों नहीं ?

4. नाम और पद की तख्ती लगाकर बिना नंबर के कैसे रसूखदार अपनी गाड़ियां सड़क में घुमा रहे हैं ??

यदि वाकई में ट्रैफिक पुलिस ट्रैफिक नियमों की सख्ती को लेकर काफी गंभीर है और उसे किसी की जान की भी परवाह नहीं है। तो फिर उसे अपनी सख्ती इसी तरीके से बरकरार रखनी होगी और अपनी ताकत का अंदाजा रसूखदारों और अधिकारियों पर भी कराना होगा।

विकास की कलम

चीफ एडिटर
विकास सोनी
(लेखक,विचारक,पत्रकार)